lबस्ती। क्या कभी आप लोगों ने ‘टेंडर’ नकली, ‘फर्म’ नकली और ‘भुगतान’ नकली होते सुना है, अगर नहीं सुना है, तो सुन लीजिए। यह तीनों नकली काम सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेम बहादुर सिंह और सीएमओ ने मिल कर किया। पिछले पांच साल में इन दोनों ने मिलकर मां काली के अमरनाथ यादव को विधुत का लगभग छह करोड़ का भुगतान किया। मामला उस समय सामने आया, जब गोरखपुर से पांच साल बाद तबादला होकर सीएमओ कार्यालय आए बाबू प्रमोद कुमार मिश्र ने इसकी पत्रावली प्रेम बहादुर सिंह से मांगी तो उनके हाथपांव फूल गए, हाथपांव इस लिए फूल गए, क्योकि इसी पत्रावली में मां काली और प्रेमबहादुर सिहं के भ्रष्टाचार का राज छिपा है। अगर प्रमोद मिश्र को पत्रावली मिल गई, तो लगभग छह करोड़ के फर्जी भुगतान और फर्जी टेंडर सहित फर्जी तरीके से ली गई अनुमति का भेद खुल जाएगा। प्रेम बहादुर सिंह और मां काली के अमरनाथ यादव कभी नहीं चाहेंगे कि पत्रावली प्रमोद मिश्र को मिले, हालांकि इसके लिए प्रमोद मिश्र की ओर से प्रेम बहादुर सिंह को पत्रावली उपलब्ध कराने के लिए पत्र भी लिखा जा चुका है। लेकिन अभी तक पत्रावली उपलब्ध नहीं करवाई गई, और न इस मामले में सीएमओ की ओर से प्रेमबहादुर सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई ही की गई, सीएमओ उन्हीं मामलों में कार्रवाई करते हैं, जिन मामलों में स्वंय फंसते है। जैसा ही हाल ही में सीएमओ ने एसपी विजिलेंस को पत्रावली उपलब्ध न कराने के मामले में प्रेम बहादुर सिंह को नोटिस थमाया।
हैरानी होती है, कि पांच साल हो गए, सीएमओ और टेंडर बाबू ने अभी तक विधुत के कार्य का टेंडर नहीं निकाला, जबकि हर साल टेंडर निकलना चाहिए, टेंडर न निकालकर मनमाने तरीके से प्रेम बहादुर सिंह की ओर से मां काली को हर साल लगभग सवा करोड़ का काम और भुगतान किया जा रहा है। इस तरह लगभग छह करोड़ का फर्जी भुगतान हो चुका है, इसी फर्जी भुगतान को छिपाने के लिए पत्रावली नहीं दी जा रही है। बता दें कि लगभग पांच साल पहले सीएमओ कार्यालय में विधुत कार्य के लिए टेंडर निकला, इसमें स्वामित्व इंटरप्राइजेज को 21 फीसद बिलो पर कमेटी ने टेंडर फाइनल किया, जब अनुबंध करने की बारी आई तो यह फर्म नहीं आई, पता चला कि यह फर्म भी मां काली के सहयोगी की है, जायसवाल एंड ब्रदर्स को भी मां काली के सहयोगी का फर्म बताया जाता है। इस फर्म ने 32 फीसद बिलो दर डाला था, लेकिन इसका टेंडर खुला ही नहीं, उधर मां काली ने स्वामित्व इंटरप्राइजेज को अनुबंध के लिए आने नहीं दिया, एक साजिश के तहत प्रेम बहादुर सिंह और अमरनाथ यादव ने अंत में फर्जी तरीके और नियम विरुद्व मां काली से 21 फीसद बिलो पर काम करने की सहमति पत्र ले लिया, जब कि सहमति पत्र लेने का कोई प्राविधान ही नहीं है, नियम यह है, कि जिस फर्म का टेंडर कमेटी फाइनल करती है, और वह फर्म अनुबंध के लिए नहीं आती तो पहले उस फर्म को ब्लैक लिस्टेड किया जाए, और उसके बाद पुनः टेंडर निकाला जाए, लेकिन न तो स्वामित्व इंटरप्राइजेज को ब्लैक लिस्टेड किया गया, और न पुनः टेंडर ही निकाला गया, बल्कि करोड़ों का बंदरबांट करने के लिए सहमति पत्र के आधार पर ऐसी मां काली फर्म के अमरनाथ यादव को काम दे दिया गया, जिसका चरित्र प्रमाण-पत्र बस्ती के डीएम और हैसियत प्रमाण-पत्र गोरखपुर के डीएम ने बनाया, जबकि नियमानुसार दोनों प्रमाण-पत्र एक ही जिले के डीएम के द्वारा बनना होना चाहिए। जब इसकी शिकायत दीपक कुमार मिश्र ने डीएम से दो साल पहले की तो डीएम ने सीडीओ और सीटीओ की जांच टीम बना दिया, जांच टीम ने अभी तक रिपोर्ट ही नहीं दिया, रिपोर्ट इस लिए नहीं दिया, क्यों कि फर्जी भुगतान सीटीओ ने किया, डीएम को भी यह देखना चाहिए, कि जिसके खिलाफ आरोप है, उसी को जांच अधिकारी बना दिया गया, चूंकि सीटीओ को फर्जी भुगतान करने के लिए चार फीसद कमीषन मिल गया, इस लिए जांच पूरा नहीं होने दे रहे है। जब इसकी शिकायत हुई और जांच कमेटी बनी, तो मां काली के अमरनाथ यादव ने यह कहना शुरु कर दिया कि मामला 20 लाख में मैनेज हो गया, अब कुछ नहीं होगा, इसकी भी शिकायत की गई। अब आप समझ सकते हैं, जब जिले के टाप क्लास के अधिकारी मैनेज हो रहे हैं, तो अगर प्रेमबहादुर सिंह और संदीप राय मैनेज हो गए तो कौन सा अपराध है।
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