बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि आखिर हिस्टीशीटर एवं गांजा तस्कर दीपक चौहान का नाम सभासद के लिए मनोनीत करने को किसने भेजा? क्या इसके लिए अकेले भाजपा जिलाध्यक्ष जिम्मेदार हैं? या फिर वह कोर कमेटी भी जिम्मेदार हैं, जिसने गांजा तस्कर के नाम पर मोहर लगाया? मीडिया में आने के बाद सवाल उठ रहा है, कि क्या जिलाध्यक्ष को इस्तीफा दे देना चाहिए, या फिर उस कोर कमेटी जिसमें वर्तमान/निर्वतमान जिलाध्यक्ष, हारे जीते एमपी एमएलए, जिला प्रभारी मंत्री, जिला पंचायत अध्यक्ष और जिला प्रभारी शामिल है, को इस्तीफा देना चाहिए। नैतिकता तो यही कहता है, कि इस मामले में पूरी कोर कमेटी को इस्तीफा देना चाहिए, क्यों कि इन सभी को गांजा तस्कर को सभासद मनोनीत करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है? यह अपनी-अपनी जिम्मेदारी से यह कर नहीं बच सकते हैं, कि जब तक अपराध साबित नहीं हो जाता, तब तक किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता, यह कर एक तरह से जिलाध्यक्ष गांजा तस्कर का बचाव कर रहे हैं, और उसे क्लीन चिट दे रहे हैं, ऐसे कथित अपराधी को जिलाध्यक्ष क्लीन चिट देने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके बारे में सीओ कह चुके हैं, कि इस पर गुंडा एक्ट सहित अन्य गंभीर आरोपों में मुकदमा दर्ज है। अगर यह लोग जिम्मेदार नहीं हैं, और इन लोगों ने गांजा तस्कर के नाम पर मोहर नहीं लगाया, तो इन्हें सामने आकर बताना चाहिए, कि कोर कमेटी के सदस्य के रुप में उनका हस्ताक्षर नहीं है, अगर इसमें कोई आगे नहीं आता और इसका विरोध नहीं करता तो माना जाएगा, कि पूरी कोर कमेटी गांजा तस्कर को सभासद बनाने के लिए जिम्मेदार है। बहुत बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि अगर इतने जिम्मेदार लोगों के रहते एक गांजा तस्कर सभासद मनोनीत हो जाता है, तो ऐसे लोगों के कोर कमेटी में रहने से भाजपा को और समाज को क्या लाभ? ऐसा लगता है, कि भाजपा में कोर कमेटी का गठन दिखावे का है। क्यों कि जिले में होता वही है, जो दो लोग चाहते हैं, अगर दो लोगों के चाहने और न चाहने पर लोग मनोनीत होते हैं, तो फिर कोर कमेटी के गठन करने का क्या मतलब? पूरा जिला जानता है, कि होता वही है, जो दो लोग चाहते है। इन्हीं दोनों के कारण जिले में भाजपा का कई खेमा बटं चुका है। जिसका नुकसान पार्टी को और लाभ दो लोगों का हो रहा है। गन्ना समिति के चेयरमैन के चयन के मामले में ही यही हुआ, जो सभासद के चयन में हुआ। दो लोगों ने मिलकर गन्ना माफिया के परिवार के सदस्य को चेयरमैन का टिकट दे दिया, कोर कमेटी देखती रह गई, और गन्ना माफिया चेयरमैन की कुर्सी पर काबिज हो गया। सवाल उठ रहा है, कि जब गन्ना माफिया और गांजा तस्कर को ही चेयरमैन और सभासद बनाना है, तो फिर भाजपा और सपा में क्या अंतर रह गया? नाहक ईमानदारी का ढकोसला पीटते है।
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