बस्ती। तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे, डिप्टी सीएमओ डा. एके गुप्त, डा. एके चौधरी और डा. एसबी सिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा, कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि उनका जूनियर उन्हें लीगल नोटिस भी थमाएगा। जो साहब दूसरों को नोटिस थमाते थे, आज उनका जूनियर उन्हें ही नोटिस थमा रहा है, और इसके लिए नोटिस थमाने वाले सीएमएसडी स्टोर के प्रभारी एवं चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र को नहीं बल्कि उन अधिकारियों को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो मिश्राजी के कालेकारनामों पर पर्दा डालते आ रहे है। वरना एक चीफ फार्मासिस्ट अपनी बहु और बेटे के नाम फर्म खोलकर फर्जीवाड़ा करने की हिम्मत नहीं करता। ऐसे लोगों के खिलाफ साहबगण कोई कार्रवाई करने के बजाए उसके फर्म को फर्जी भुगतान तक कर रहे है। अधिकारी जब कार्रवाई के बजाए डिलिगं करने लगेंगे तो अधिकारियों का यही हाल हाल होगा। किसी भी कर्मचारी को अगर इतनी मनमानी करने की छूट दी जाएगी तो वह न तो सीएमओ और न डिप्टी सीएमओ का मान-सम्मान रखेगा, जो चाहेगा, वह करेगा। ठीक उसी तरह करेगा, जिस तरह प्रेमबहादुर सिंह और संदीप राय कर रहे है, कहा भी जा रहा है, कि अगर इन दोनों पर लगाम नहीं लगाया गया और इनकी असलियत नहीं बताई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब यह लोग साहबों की कलई खोलने लगेेंगें। किसी बाबू को अगर सिर पर चढ़ाएगें तो यही हाल होगा। तब अफसोस और पछताने के आलावा और कुछ हाथ में नहीं आएगा, और यह सब तक होगा, जब साहब ईमानदार होगें, और जब साहब ईमानदार होगें, तो चीफ फार्मासिस्ट और बाबू की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह साहब से आंख मिला सके। लेकिन साहब अगर घर बुलाकर उससे 15वां वित्त आयोग के पांच करोड़ का बंदरबांट कराएगे तो वह मनमानी करेगा ही।
हम आप लोगों को उस नोटिस के राज के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे अजय मिश्र ने तत्कालीन सीएमओ और तीन डिप्टी सीएमओ को थमाया। हालांकि एक दिन पहले मीडिया यह बता चुकी है, नोटिस भेजने के पीछे अवष्य कोई राज छिपा है, और अब वह राज खुल गया। नोटिस भेजे जाने के पीछे वह पृष्टिभूमि तैयार करने की बात कही जा रही है, जिसमें
शासन ने अजय मिश्र का तबादला तत्कालीन सीएमओ के निरीक्षण रिपोर्ट के बाद डीजी हेल्थ को लिखा। अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों ढ़ाई साल बाद और बिना तिथि के नोटिस जारी किया गया। यह नोटिस इस लिए जारी किया गया, ताकि आवष्यकता पड़ने पर इसे कोर्ट या शासन में प्रस्तुत किया जा सके। मीडिया में इस लिए नोटिस को प्रकाशित करवाया गया, ताकि साक्ष्य मौजूद रहे। अब आप लोग नोटिस भेजने के पीछे के राज का पता चल गया होगया, जिस दिन नोटिस जारी हुआ, उसी दिन से नोटिस भेजने की मंशा पर सवाल उठने लगें थे। वरना देखा जाए तो ढ़ाई साल बाद नोटिस भेजने का न तो कोई औचित्य और न इसकी कोई विधिक मान्यता है। यह नोटिस मिश्राजी के बचाव का साधन बन सकता है, ऐसा जानकारों का कहना और मानना है। वैसे भी मिश्राजी के बारे में यह कहा जाता है, यह कोई काम बिना मतलब के नहीं करते, इसी को इनकी सफलता का राज कहा जाता है। आखिर एक मिश्रा दूसरे मिश्रा के काम आ ही गया। जिस मिश्राजी ने नोटिस का खाका तैयार किया, वह मिश्राजी से भी एक कदम आगें है। हालांकि मिश्राजी की पहचान हो चुकी है। ध्यान रहे, जिसे भी नोटिस भेजा गया, वह पंजीकृत नहीं बल्कि वाट्सअप पर भेजा गया, इसमें भी कोई राज छिपा है।
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