बस्ती। अगर पुलिस नाबालिग के रेप के आरोपी को बचाएगी तो पीड़िता और उसके परिवार को न्याय कैसे मिलेगा? जाहिर सी बात हैं, कि इससे आरोपी का मन बढ़ेगा, और कल को वह अन्य नाबालिग को भी अपना शिकार बनाएगा, एक दिन वही रेपिस्ट पुलिस के लिए सिर दर्द हो जाएगा। ऐसा ही एक मामला वाल्टरगंज थाने के एक गांव का सामने आया। आरोपी उमेष यादव पुत्र देवेंद्र प्रताप यादव के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हैं, न्यायालय आरोपी का जमानत भी खारिज कर चुकी है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि आरोपी जमानत कराने के लिए घर से न्यायालय जाता है, और वाल्टरगंज की पुलिस देखती रह जाती है। जिस आरोपी को जेल में होना चाहिए, वह पुलिस की मेहरबानी से आजाद घूम रहा है। इसे लेकर पीड़िता के परिवार वालों ने एसपी से गुहार लगाई हैं, और आरोपी को जेल भेजने की मांग की है, क्यों कि आरोपी उसकी लड़की और परिवार को मुकदमा वापस लेने के लिए दबाव बना रहा है, डरा धमका रहा है, जान से मार देने की धमकी तक दे रहा है। जिसके चलते परिवार का जीना हराम हो गया है। परिवार का आरोप है, आरोपी निरंतर पुलिस के संपर्क में हैं, और पुलिस को उसकी एक-एक गतिविधि का पता है, फिर भी उसे गिरफतार नहीं कर रही है। कहा कि एसओ और अन्य पुलिस कर्मी मोबाइल से बराबर बात कर रहे है। चूंकि आरोपी पैसे वाले हैं, इस लिए पुलिस उनकी मदद कर रही है। पुलिस पर जिस तरह से रेप जैसे गंभीर आरोपी को बचाने का आरोप लग रहा है, उससे न सिर्फ पुलिस की छवि खराब हो रही है, बल्कि समाज में भय का माहौल व्याप्त हो रहा है। यही सब कारण है, कि पुलिस आदमी का दोस्त नहीं बन पा रही है, जिस पुलिस पर अपराधिरियों को सजा दिलाने और उन्हें जेल भेजने की जिम्मेदारी है, अगर उसी पुलिस पर आपराधियों को बचाने और उन्हें संरक्षण देने का आरोप लगता है, तो समाज के लोग कैसे भयमुक्त समाज की कल्पना कर सकते है? कहा भी जाता है, कि अगर पुलिस चाह जाए तो किसी बच्चे का खिलौना तक गायब नहीं हो सकता, रेप करना तो बहुत दूर की बात है। जिस पुलिस को सबसे अधिक संवेदनशील होना चाहिए, अगर वही असवेंदनशील हो जाए तो सभ्य समाज का क्या होगा? बार-बार न्यायालयों की ओर से पुलिस के कामकाज पर गभंीर टिपणी की जा रही है, सरकार को नषीहत तक दी जा रही है, बावजूद पुलिस आम लोगों के अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रही हैं। पुलिस तब सक्रिय होती है, जब उनके या फिर उनके परिवार के साथ में कोई बढ़ी घटना घटित होती है। तब वह अपराधियों के सबसे बड़े दुष्मन बन जाते हैं, और उन्हें मिटटी में मिलाकर ही दम लेते है।