बस्ती।  पिछले 20 सालों से सीएमओ कार्यालय पर राज करने वाले सीएमएसडी स्टोर के प्रभारी एवं चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र के खड़ा किए गए साम्राज्य का किला ढ़हने के कगार पर पहुंच चुका है। शासन ने इनका तबादला करने के लिए डीजी हेल्थ को एक दिन पहले लिखा है। चूंकि मामला मुख्यमंत्री से संदर्भित हैं, इस लिए तबादला रुकने की संभावना कम हैं, वैसे इस विभाग में कोई भी चीज अंसभव नहीं, जब करोड़ों का घोटाला करके लोग बच जाते हैं, तो यह तो उस अजय मिश्र का केस हैं, जिसने इतने सालों में राजधानी की इतनी यात्रा की, जितना घर का नहीं किया होगा, इनका एक पैर राजधानी तो दूसरा बस्ती में रहा। मिश्राजी के तबादले का आदेश तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे के उस निरीक्षण रिपोर्ट पर दिया गया, जो इन्होंने लगभग ढ़ाई साल पहले सीएमएसडी स्टोर का किया था, और जहां पर अभिलेखों में वार्ड ब्याय राम ललित बौद्व के द्वारा मिश्राजी का फर्जी हस्ताक्षर करना पाया गया था। कागजों में इसके लिए दोनों को दोषी भी माना गया, तत्कालीन सीएमओ की कार्रवाई पर भी षासन ने भी कई सवाल उठाए हैं, और कहा कि जब फ्राड पकड़ा गया तो क्यों नहीं सीएमओ ने कूटरचित हस्ताक्षर बनाने के आरोप में एफआईआर दर्ज करवाया? क्यों नहीं अब तक अनुशासनिक जांच की गई? क्या अजय मिश्र को यह नहीं मालूम था, कि वार्ड ब्याय उनका फर्जी हस्ताक्षर बना रहा? क्यों अजय मिश्र को यह बात उस समय पता चली, जब सीएमओ ने निरीक्षण किया? क्यों नहीं हस्ताक्षर की फोरेंसिक जांच करवाई गई? क्या कूटरचना के जरिए अन्य कोई गड़बड़ी तो नहीं की गई? पूछा कि जब अजय मिश्र की जन्म तिथि पांच जनवरी 1959 हैं, तो यह रिटायर कब होगें? तत्कालीन सीएमओ पर सवाल उठना लाजिमी हैं, क्यों कि इन्होंने वार्ड ब्याय का तो 18 जून 24 को सीएचसी परसरामपुर तो कर दिया, लेकिन इन्होंने न तो चीफ फार्मासिस्ट और न वार्ड ब्याय के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया, और अनुसासनिक जांच ही किया। माना जाता है, कि एफआईआर न दर्ज के पीछे कोई डील हुआ होगा। जाहिर सी बात हैं, डील पैसे का ही हुआ होगा, क्यों कि कोई  भी सरकारी कर्मचारी निलंबन की कार्रवाई तो झेल लेता है, लेकिन विधिक कार्रवाई नहीं झेल पाता, नौकरी और जेल जाने का खतरा जो रहता है। मीडिया एक दिन पहले इस मामले में तत्कालीन सीएमओ पर सवाल खड़ा कर चुकी है। सच तो यह है, कि तत्कालीन सीएमओ ने इस मामले में जो कार्रवाई नियमानुसार करनी थी, उसे नहीं किया, अगर कर दिया होता तो आज मिश्राजी इन्हें लीगल नोटिस न थमाते। इससे उन आरोपों को बल मिलता हैं, जिसमें निरीक्षण करने के पीछे कोई मकसद बताया गया था, अगर मकसद कार्रवाई करना होता तो उसी समय हो गया होता, इसी तरह अगर मिश्राजी को लीगल नोटिस भेजना होता तो उसी समय भेजते, क्यों ढ़ाई साल बाद भेजा? सवाल उठ रहा है, कि जो कार्रवाई षासन स्तर पर ढ़ाई साल पहले होनी चाहिए थी, वह ढ़ाई साल बाद क्यों हो रही? इसका सीधा सा जबाव मिश्राजी का मनी और पावर। सवाल तो वर्तमान सीएमओ डा. राजीव निगम पर उस वार्ड ब्याय को पुनः सीएमएसडी स्टोर में तैनाती को लेकर उठ रहे हैं, इसके लिए मिश्राजी और निगमजी का गठजोड़ माना जा रहा है। आखिर सीएमओ साहब के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी थी, कि ऐसे वार्ड ब्याय का तबादला सीएमएसडी स्टोर में पुनः कर दिया, जिसे खिलाफ तत्कालीन सीएमओ फर्जी सिग्नेचर का दोशी मानते हुए, परसरामपुर सीएचसी पर तबादला कर चुके थे, एक सीएमओ अगर दूसरे सीएमओ के आदेष का सम्मान नहीं करेगें तो फिर करेगा कौन? मिश्राजी तो करेगें नहीं। इसी लिए बार-बार कहा जाता है, इस विभाग में छोटे और बड़े का कोई मतलब नहीं, मतलब हैं, तो सिर्फ पैसे का। देखा जाए तो इस मामले में कार्रवाई तो वर्तमान सीएमओ के खिलाफ भी होना चाहिए।