"पिलखुआ"
सकल हिन्दू समाज के तत्वावधान में आयोजित विराट कवि सम्मेलन राष्ट्रप्रेम, चेतना और संस्कारों का अनुपम संगम बन गया। मंच से बहे शब्द केवल पंक्तियाँ नहीं थे, वे सरहदों पर खड़े जवानों की साँस, शहीदों के सपने और माँ भारती की धड़कन बनकर श्रोताओं के हृदय में उतरते चले गए। काव्य, गीत और ग़ज़लों ने ऐसा समाँ बाँधा कि सभागार तालियों और भावनाओं से गूँज उठा।
कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात कवि-गीत एवं ग़ज़लकार डॉ. अनिल बाजपेयी ने जब राष्ट्रभाव से ओतप्रोत पंक्तियाँ पढ़ीं—
“सरहद पर जागते हैं जो रात-भर, उनकी हर साँस वतन के लिए,
गोली-बारूद में बीतता है जीवन, सीने में जलता अरमान वतन के लिए।”
मंच संचालन करते हुए डॉ. सतीश वर्धन ने तीखी और यथार्थपरक पंक्तियों से चेतना को झकझोरा—
“मीर जाफ़रों, जयचंदों की कमी नहीं है देश में,
कोई साधु वेश में रहता, कोई मौलवी वेश में…
रोज़ी-रोटी मेरे देश में, गुणगान पाकिस्तान का,
अरे बेशर्मो! कुछ कर्ज़ उतारो मेरे हिंदुस्तान का।”
युवा कवि सौरभ राणा ने शहीदों की परंपरा को नमन करते हुए कहा—
“जितने भी अमर शहीद हुए, उन्हीं के पदचिह्नों पर यह जवानी चलती रहे;
हम राष्ट्रहित में काव्य पढ़ते हैं,
वहीं कपिलवीर सिंह की पंक्तियाँ आशा और साधना का संदेश बनकर उभरीं—
“ज़माना साथ न दे तो मायूस मत होना,
हुनरमंदों के संग क़ाफ़िले कम ही निकलते हैं;
बुरे हालात की मिट्टी, ज़माने की तपन से ही,
बने होते हैं जो दी
मुख्य अतिथि नीलिमा नंद ने कहा कि कविता समाज की आत्मा है—जब यह राष्ट्र और संस्कार से जुड़ती है, तब पीढ़ियों का पथ प्रशस्त करती है।
कार्यक्रम अध्यक्ष
संघ चालक विपिन अग्रवाल ने कवियों को समाज का दीपस्तंभ बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन राष्ट्र की वैचारिक धारा को मजबूत करते हैं।
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