जिला ‘पंचायत’ का खुला ‘आफर’ः 25 ‘लाख’ लाइए, ‘चाबी’ ले ‘जाइए’

बस्ती। बस्ती का जिला पंचायत प्रदेश का पहला ऐसा पंचायत होगा, जहां पर योजना बनने और परवान चढ़ने से लूटखसोट का खाका तैयार कर लिया जाता है। दुकान की नींव रखते ही बोली लगनी शुरु हो जाती है। जिस दुकान की सरकारी लागत पांच लाख होती है, उसके लिए 25-25 लाख तक जिए जाते है। कहा जाता है, कि पांच लाख का तो चेक चाहिए, बाकी 20 लाख नकद चाहिए। जिला पंचायत ने दुकान आवंटन के मामले में जो खेल विकास भवन के बगल वाले दुकानों में खेला, वही खेल त्रिपाठी टाकीज सिनेमा रोड के दुकान में भी खेला जा रहा है। जिस जगह जिला पंचायत दुकान बनवा रहा है, वहां पहले पीएनबी बैंक था। अभी पिलर खड़ा ही हुआ, कि 25 लाख की बोली मार्केट में लग गई। कुल 13 दुकानों का निर्माण होना है, अगर जिला पंचायत के खुले आफर को देखे तो वैसे जिला पंचायत के खजाने में तो 65 लाख जाएगा, लेकिन जिम्म्ेदारों की जेबों में दो करोड़ 60 लाख जाएगा। अब इसमें कितने हिस्सेदार होगें, इसका कहना मुस्किल हैं, दो का तो सभी को मालूम है। अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों जिला पंचायत अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जिला पंचायत अध्यक्षों, ब्लॉक प्रमुखों और प्रधानों को प्रशासक बनाने के लिए पत्र लिखा था। यह भी लिखा था, कि जो गुणवत्तापरक कार्य प्रशासक के रुप में जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और प्रधान कर लेगें, वह सरकारी अधिकारी नहीं कर पाएगें।

त्रिपाठी सिनेमा रोड वाले दुकान के आंवटन में ऐसा खेल खेलने की रणनीति बनाई गई, वैसा इससे पहले नहीं देखा गया। चूंकि दुकान बहुत मौके पर और क्रीम स्थान पर है, इस लिए इसका दाम 25 लाख रखा गया, पांच लाख का चेक देना होगा और 20 लाख नकद, यह पैसा चर्चित और बदनाम उपाध्यायजी के पास जमा करना होगा। जिसने पैसा दे दिया, उसके लिए कोई लाटरी नहीं निकाली जाएगी, उपाध्यायजी को यह जिम्म्ेदारी दी गई हैं,  िकवह बाजार में घूम-घूम कर ग्राहक तलाष करें, बताते हैं, कि उपाध्यायजी के जाल में अब तक चार लोग फंस भी चुके है।, इनमें रवि चूड़ी वाले, खालसा मोबाइल वाले और कमाल लेदर का नाम षामिल है। इन सभी से 100-100 रुपये की रसीद भी कटवा ली गई है। बताते हैं, कि जिला पंचायत वाले तीनों से तो रशीद इस लिए कटवा लिया, ताकि उसी को दिखाकर ग्राहक को फंसाया जा सके। चूंकि तीनों का नाम बड़े और नामी कारोबारियों में शामिल है, इस लिए इन तीनों को अपना निषाना बनाया, ताकि इसी जीनों के नाम का सहारा लेकर मछली को जाल में फंसाई जा सके। एक तरह से यह लोग जबरदस्ती 100 रुपये आवेदन ष्षुल्क के नाम पर ले रहे है। इनके पहले शिकार बनी रजनी गुप्त पत्नी स्व. संदीप गुप्त दूसरे नंबर के षिकार बनी तन्या गुप्ता पति हिंमाशु गुप्त। खासबात यह है, कि 100 रुपया का रसीद तो नाम से काट दे रहे हैं, लेकिन तारीख नहीं डाल रहे हैं, यहां तक जिस बाबू ने रसीद काटा उसका भी हस्ताक्षर नहीं हैं। दो रुपये के आवेदन फार्म को 100 रुपया वसूला जा रहा है। वैसे कोई भी इतनी मंहगे दर में दुकान लेने को तैयार नहीं है, यह बात रसीद काटने वाले बाबू से बता भी दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अभी तक दुकान बनी नहीं, और नही दुकान के नीलाम होने की घोषणा ही हुई, और ग्राहक फंसाना शुरु कर दिया। अगर किसी कमो जाते-जाते इतनी बड़ी रकम मिल जाएगा, तो चह कुछ भी करने को तैयार रहेगा। अब देखना है, कि ईमानदारी का एचएमबी रिकार्ड बनाने वाले गिल्लम एंड पार्टी इसका कितना विरोध करती है। न्याय मार्ग वाली दुकान का तो विरोध किया नहीं, इसका क्या करेगें। उपाध्याजी को सख्त निर्देश दिया गया है, कि हर हाल में 11 जुलाई से पहले दो करोड़ 60 लाख आ जाना चाहिए। अगर कहीं 10 जुलाई को चुनाव कराने का हाईकोर्ट का निर्णय आ गया, जिसकी संभावना अधिक है, तो रेट का घटाना पड़ सकता है। जिस स्थान पर जनहित को देखते हुए जिला पंचायत को पार्किंग का निर्माण करवाना चाहिए था, जो कि शहर की सबसे बड़ी समस्या है, उसे न बनवा कर दुकान बनवाया जा रहा हैं, ताकि अधिक से अधिक कमाई की जा सके। जिस विभाग में हर कोई सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ हो, उस विभाग के लोगों से जनहित की उम्मीद करना भी बेमानी होगा। अगर सभी जिला पंचायत सदस्य चाह लिए होते हैं, तो गांधीनगर के जाम की समस्या दूर हो जाती और विभाग को अच्छीखासी राजस्व मिलता रहता। लेकिन जिन सदस्यों को ब्लैकमेल करने की आदत पड़ी हो, उन सदस्यों से ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती? सवाल उठ रहा है, कि पार्किंग जरुरी कि दुकान?