न ‘शुक्लजी’ और न ‘त्रिपाठीजी’ को मिला ‘न्याय’, मिला सिर्फ ‘आष्वासन’
बस्ती। कहना गलत नहीं होगा कि ‘शुक्लजी’ और ‘त्रिपाठीजी’ के जमीनी विवाद के मामले में कमिष्नर, डीएम, एसपी, प्रेस क्लब और व्यापार मंडल भरोसे के लायक नहीं रहें। बता दें कि पिता विपिन बिहारी त्रिपाठी और पुत्र विवेक त्रिपाठी दोनों पत्रकार के साथ एक कुशल और सफल कारोबारी भी हैं। पुत्र के नाम तो जिले में सबसे अधिक जीएसटी का भुगतान करने का रिकार्ड है। यकीन जानिए, अगर इन लोगों ने ईमानदारी दिखाई होती तो सम्मानजनक रास्ता निकल गया होता। घटना के लगभग 12 दिन हो गए, लेकिन अभी तक दोनों पक्षों के बीच वह सम्मान जनक समझौता नहीं हुआ, जिसका आष्वासन सभी लोग पिछले 12 दिन से देते आ रहें हैं। सवाल उठ रहा है, कि सम्मानजनक रास्ता निकलेगा तो कैसे? जब अभी तक प्रशसन दोनों पक्षों को एक टेबुल पर बैठा नहीं सका। जब कि कमिष्नर से लेकर डीएम और एसपी तक कह चुके हैं, कि चिंता मत करिए, हम लोग ऐसा रास्ता निकाल रहे हैं, जिसमें दोनों का सम्मान रह जाएगा। डीएम और एसपी तो पत्रकार को व्यक्तिगत बुलाकर आष्वासन भी दे चुके है, भले ही चाहें डीएम ने पत्रकारों का ज्ञापन नहीं लिया, लेकिन कमिष्नर और एसपी ने तो लिया, और कार्रवाई का आष्वासन भी दिया। अक्सर देखा गया है, जब भी इस तरह का हाईप्रोफाइल मामला होता है, प्रशासन वही रुख अपनाता जो आज शुक्लजी और त्रिपाठीजी के मामले में अपना रहा है। रही बात पत्रकार संगठनों और व्यापार मंडल की तो यह लोग इस मामले में पूरी तरफ विफल रहे। सबसे अधिक निराशाजनक भूमिका उस प्रेस क्लब के अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारियों की रही, जिसके पत्रकार विपिन बिहारी त्रिपाठी और उनके पुत्र विवेेक त्रिपाठी सदस्य हैं, विपिन बिहारी त्रिपाठी तो कार्यकारिणी सदस्य भी है। इस संगठन के पदाधिकारी पिछले 12 दिन से मेलमिलाप कराने की रणनीति बना रहे है। वह तो भला हो ‘नेशनल प्रेस क्लब’ के जिलाध्यक्ष संतोश सिंह और उनकी टीम का, जिन्होंने विरोध जताया और कमिष्नर एवं एसपी को ज्ञापन भी दिया। वरना, पत्रकारों की तो नाक ही कट गई होती। जिसको देखो वही कह रहा है, कि क्या जिले के पत्रकार इतने कमजोर हो गए हैं, कि वह अपने साथी को न्याय तक नहीं दिला पा रहे है। इस घटना का अंजाम चाहें जो भी हो, लेकिन पत्रकार संगठनों की जो भूमिका सामने आई वह काफी निराशाजनक और चौकाने वाला रहा। जिले में एक दर्जन से अधिक पत्रकार संगठन हैं, जो पत्रकारों के हितों की रक्षा और उन्हें न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे है। ऐसे भी संगठन हैं, जिसके प्रदेश और राष्टीय स्तर के पदाधिकारी बस्ती के है। यह लोग बड़े-बड़े पुरस्कार और सम्मान तो ले लेते हैं, लेकिन जब कभी पत्रकारों की लड़ाई लड़ने या फिर उनके साथ खड़ा होनेे की बारी हैं, तो भूमिगत हो जाते है। प्रेस क्लब की तरह व्यापार मंडल के पदाधिकारी भी अभी तक अधिकारियों से मिलकर उन्हें ज्ञापन देने की रणनीति बना रहंे हैं। सच तो यह है, कि कोई सामने आ कर यह नहीं कह पा रहा है, कि गलत क्या है, और सही क्या? इस तरह के लोग दोस्ती और रिष्ता दोनों को निभाना चाहते है। कोई अपने सामाजिक दायित्वों का निवर्हन नहीं कर रहा है। जिस समाज में सच को सच और गलत को गलत कहने की हिम्मत न हो उस समाज से अधिक उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। लोगों को यह सोच कर, कोई लड़ाई लड़नी चाहिए कि अंत में लड़ाई उसे अकेले ही लड़नी पड़ेगी। इस एक छोटी सी घटना ने दोनों पक्षों को अपने और पराए को समझने का अवसर दे दिया होगा। ऐसे भी डरपोक व्यापारी/मित्र भी सामने आए, जो इस नाते पत्रकार साथी के घर या फिर फोन से हाल चाल नहीं लिया, कि अगर कहीं शुक्लजी को पता चल जाएगा तो वह बुरा मान जाएगें। त्रिपाठीजी के परिवार को प्रशासन से उतनी तकलीफ नहीं हुई, जितना प्रेस क्लब और व्यापार मंडल के पदाधिकारियों से हुई। इस घटना ने प्रेस क्लब और व्यापार संगठन दोनों कमजोर कर दिया। इसका प्रभाव आने वाले दिनों में दिखेगा भी। सवाल उठ रहा है, कि आखिर फोरम बनते किस लिए हैं? जब फोरम अपने सदस्यों की लड़ाई तक न लड़ सके। ऐसे फोरम के मुखिया को तो चाहिए कि वह इस्तीफा दे दे, हो सकता है, कि इससे उनकी थोड़ी बहुत इज्जत बच जाए। आज वह बात लोगों की सच सााबित हो रही है, जिसमें घटना के दिन ही कहा गया था, कि कोई एफआईआर वार दर्ज नहीं होगा, और न कुछ होगा। जब से अधिकारियों ने सम्मान जनक रास्ता निकालने को कहा, तब से यह सवाल उठ रहा है, कि आखिर वह सम्मान जनक रास्ता क्या है? कुछ लोगों का तो यह भी कहना है, कि अगर प्रशासन को सम्मान जनक रास्ता निकालना होता तो काफी पहले निकाल दिया होता। न सम्मानजनक रास्ता निकला और न न्याय मिला, मिला तो सिर्फ बदनामी और पीड़ा। अब आप लोग एक जमीन के टुकड़े का महत्व समझ ही गए होगें, अगर न समझे सके हों तो कचहरी जाइए और किसी वकील साहब से पूछ लीजिए कि जमीन का टुकड़ा क्या-क्या कराती है?
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