बस्ती। सीएमओ कार्यालय में प्रेम बहादुर सिंह की इतनी प्रेम गाथा हैं, कि उसका कोई अंत नहीं। इन्होंने पैसे के लिए न सिर्फ अपने मां-बाप का नाम खराब किया, बल्कि विभाग को चूना भी लगाया, यह उन बाबूओं में षामिल है, जो भ्रष्टाचारियों के लिए किसी भी हद तक जा सकते, नौकरी और इज्जत को भी दांव पर लगा सकते है। इन्हें भी लक्ष्मी से उतना प्यार हैं, जितना सीएमओ और मां काली टेडर्स के अमरनाथ यादव को। इन्होंने अमरनाथ यादव से मिलकर न सिर्फ सरकार को धोखा दिया, बल्कि लाखों रुपया का चूना भी लगाया। एक ऐसे फर्म के मालिक को इन्होंने सीएमओ के साथ मिलकर इतना बड़ा खेल खेला कि अगर जांच रिपोर्ट पर तत्कालीन डीएम कार्रवाई कर देते और मैनेज न हुए होते तो आज यह अपने आका के साथ जेल में होते। ऐसी साजिश रची कि देखने वाले दंग रह गए। ऐसा खेल खेला कि बड़े-बड़े खिलाड़ी हार मान गए। इस फर्म को विधुत का अनुबंध कर दिया, जो नियम विरुद्व था, जिन स्वामित्व इटंरप्राइजेज गोरखपुर के नाम कमेटी ने 21 फीसद बिलो रेट पर टेंडर फाइनल किया, उसे बिना ब्लैक लिस्ट किए, मां काली के नाम 11 फीसद बिलो दर पर अनुबंध कर दिया, जब कि इस फर्म का हैसियत और चरित्र प्रमाण-पत्र दो जनपदों के डीएम के द्वारा बनाया गया, जबकि नियमानुसार एक ही जिले के डीएम दोनों का प्रमाण-पत्र बनाते है। नियमानुसार जिस फर्म के नाम कमेटी ने टेडर को फाइनल कर दिया, उसे ब्लैक लिस्ट किए बिना किसी अन्य फर्म का अनुबंध हो ही नहीं सकता, अनुबंध तब होगा, जब नए टेंडर का प्रकाशन होगा। लेकिन सीएमओ और प्रेमबहादुर सिंह ने मिलकर पैसे के लिए सारे नियम कानून को ताक पर रखकर मां काली के नाम अनुबंध कर दिया। खासबात यह है, कि स्वामित्व इंटरप्राइजेज भी अमरनाथ यादव का फर्म हैं, अगर स्वामित्व इंटरप्राइजेज का अनुबंध होता तो उसे 21 फीसद बिलो पर काम करना पड़ता, इसी लिए 10 फीसद बचाने के लिए नियम विरुद्व मां काली के नाम अनुबंध कर दिया। जायसवाल, स्वामित्व और मां काली तीनों फर्मे अमरनाथ यादव की है। इन्हीं तीनों फर्मो के नाम टेंडर डाला जाता है, और सेटिगं के जरिए जिसका रेट कम होता है, उसी का अनुबंध कर दिया जाता है। मां काली टेडर्स इस लिए कम दर डालती है, क्यों कि इस फर्म का पेपर अपूर्ण है। इस फर्म के मालिक और प्रेमबहादुर सिंह एवं सीएमओ, हर्रैया की सीएमएस, महिला अस्पताल के सीएमएस, टीबी अस्पताल के सीएमएस मिलकर हर साल एक करोड़ का फर्जी भुगतान करते हैं, काम 20 फीसद होता, और भुगतान 100 फीसद। इस खेल में सीटीओ भी शामिल है, इस खेल की विशेषता यह है, कि हर साल के माह मार्च में एक सप्ताह के भीतर बिल भी बनता और भुगतान भी होता, और साल भर काम भी होता है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि एक करोड़ का कार्य क्या एक सप्ताह में हो सकता है? वह भी विधुत का। लेकिन प्रेम बहादुर सिंह जिसके साथ हैं, वहां कुछ भी संभव हैं। भुगतान करने से पहले सीटीओ को उनका चार फीसद कमीशन और बिल प्रेमबहादुर सिंह के द्वारा पहुंच जाता है। अमरनाथ यादव कभी भी बिल और कमीषन लेकर सीटीओ के पास नहीं जाते, यह काम प्रेम बाबू बखूबी करते है। एक और खासबात हैं, बिना टेक्नालिस्ट के सत्यापन के बिल प्रस्तुत हो जाता है। यही वह मां काली का मालिक हैं, जिसने कहा था, कि उसने 20 लाख में मैनेज कर दिया।
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