बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब कमिश्नर नगर पंचायतों के करोड़ों रुपये के वित्तीय प्रस्ताव का अनुमोदन नहीं दे रहें हैं, तो कौन दे रहा? और बिना अनुमोदन के हर साल करोड़ों खर्च कैसे हो रहें है? क्यों नहीं इसकी जांच एडीएम और डीएम स्तर से होती? सबसे बड़ा सवाल जिस प्रस्ताव का अनुमोदन एडीएम के द्वारा डीएम के माध्यम से कमिश्नर को जाना चाहिए, उस प्रस्ताव को क्यों नहीं नगर पंचायतें जिले पर भेज रही है? आखिर इसका जिम्मेदार कौन हैं? चेयरमैन या ईओ? जब इस मामले में कमिश्नर से पूछा गया तो उन्होंने कहा उनके पास वित्तीय अनुमोदन के लिए प्रस्ताव नहीं आ रहे है। पहले जब कमिश्नरर के यहां अनुमोदन के लिए प्रस्ताव आता था, तो उसकी क्वेरी होती थी, जिसमें कई प्रस्ताव का अनुमोदन ही नहीं दिया जाता था।
जानकार बताते हैं, कि जिले में इस लिए अनुमोदन के लिए प्रस्ताव भेजा जाता था, ताकि किसी वित्तीय अनियमितता को रोका जा सके। नियमानुसार अगर बोर्ड के द्वारा किसी काम का प्रस्ताव किया गया तो उसके वित्तीय अनुमोदन के लिए प्रस्ताव को एडीएम के पास भेजा था, एडीएम के हस्ताक्षर के बाद डीएम के माध्यम से अंतिम अनुमोदन के लिए प्रस्ताव को कमिष्नर के पास भेजे जाने का प्राविधान है। हैरानी होती है, हर माह जिले स्तर पर इसकी मानिटरिंग एडीएम की अध्यक्षता में होती है, तो फिर सवाल उठ रहा है, कि पिछले तीन सालों से किसी एडीएम ने यह क्यों नहीं देखा कि नगर पंचायतें क्यों नहीं जिले पर अनुमोदन के लिए प्रस्ताव भेज रही है? आखिर इस विभाग का एलबीसी कार्यालय क्या कर रहा है? इससे साफ होता है, कि एलबीसी कार्यालय वही करता है, जो नगर पंचायतें चाहती हैं, वैसे भी इससे पहले भी एलबीसी कार्यालय पर अनेक गंभीर आरोप लग चुके है। सवाल उठ रहा है, कि जो एलबीसी सीधे एडीएम के अधीन हो वह कार्यालय कैसे मनमानी कर सकता है? और उस कार्यालय के लोगों पर कैसे आरोप लगते रहें हैं? यह सही है, कि एलबीसी कार्यालय भ्रष्ट नगर पंचायतों के बचाव के ढाल का काम कर रही है। जिले भर के नगर पंचायतों में भ्रष्टाचार की लूट मची हुई, लेकिन आज तक एक भी नगर पंचायत के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, जो शिकायत करता भी है, तो उसकी जांच ही नहीं होती, अगर होती भी है, तो उसे भी लीपापोती कर दी जाती है। नगर पंचायतें जिस तरह बेलगाम हो चुकी है, उसके लिए पूरी तरह एलबीसी कार्यालय को जिम्मेदार माना जा रहा है, एलबीसी कार्यालय को जिम्मेदार मानने का मतलब एडीएम को जिम्मेदार मानना। कहा भी जाता है, कि बजाए दस नगर पंचायतों को सुधारने को अगर एडीएम साहब सिर्फ एलबीसी कार्यालय को सुधार लें तो काफी हद तक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया जा सकता है। हालांकि कमिश्नर ने इसकी जांच करने की बात कही है। नगर पंचायतों का प्रस्ताव को हाईजैक करने के पीछे मनमाने तरीके से धन को खर्च करना, इससे अन्य योजना का धन अन्य योजना में खर्च करने की संभावना बनी रहती है। शायद ही कोई ऐसी नगर पंचायत हो जो प्रस्ताव को हाईजैक न किया हो। एकाद ईमानदार भी हो सकती है।
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