कच्ची सड़क के निर्माण में झाऊ,पुला के ऊपर डालते थे मिट्टी
ओमप्रकाश गौतम
गढ़मुक्तेश्वर: प्राचीन काल से अपनी परंपराओं के सजोए गढ़ गंगा स्नान मेला लगता आ रहा है मेला का अब आधुनिक युग में स्वरूप बदल रहा है। मेला की व्यवस्था में सैकड़ों मजदूरों का स्थान जेसीबी ने ले लिया वहीं कच्ची सड़क के निर्माण में लगने वाले झाऊ के ऊपर पुला फिर मिट्टी डाली जाती थी अब जेसीबी से मिट्टी को समतल कर सड़क बनाई जा रही है। बैल गाड़ी,बुग्गी का स्थान एक ट्रेक्टर ने ले लिया। पहले बैलगाड़ी में ही घर का समान समा जाता था तथा बैलगाड़ी के पास ही पटेरा की चटाई से टैंट बनाया जाता था। अब टैक्टर में घर का समान लाया जाता है तथा बड़े बड़े अहाते बनाकर तंबू का रूप दिया जाता है। मेला खुले आसमान के नीचे तंबू नगर बसता है।
गंगा मेला लखिया कहा जाता है लगता था रमनना
चार दशक पहले गंगा स्नान मेला में एक लाख से ज्यादा बैलगाड़ी आती है। बैलगाड़ी में बैल के गले में घंटी होती थी जिनकी दूर तक आवाज जाती थी। मेला में बैलगाड़ी से आने वाले श्रद्धालुओं से जिला पंचायत द्वारा बैरियर लगाकर रमन्ना लिया जाता था। गाजियाबाद जिला अधिकारी इंदर जीत सिंह के समक्ष रमन्ना का मुद्दा उठाया था तो मौके पर ही रमन्ना फ्री कर दिया था जो बड़ी बात और पहल थी।
मुख्यमंत्री आदित्य नाथ ने किया राजकीय मेला
महाभारत कालीन प्राचीन कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेला का साढ़े पांच हजार साल पुराना इतिहास है। बारह दिवसीय गंगा मेला पांच चरणों में होता है। जिसका आयोजन जिला पंचायत करती थी, करती है। मुख्यमंत्री ने पांच जुलाई 2017 में गंगा मेला को राजकीय घोषित किया था। तथा 18 नवंबर 2018 में मेला का विधिवत उद्घाटन कर गढ़ और तिगड़ी मेला को जोड़ने के लिए गंगा पर पुल बनाए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद 22 नवंबर 2025 को मेला का उद्घाटन के गंगा पुल बनाए जाने की दुबारा घोषणा की गई मगर अभी तक गंगा पुल बनाया जाना परवान नहीं चढ़ पाया है।
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