बस्ती। सीएमएसडी स्टोर के चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र को कौन नहीं जानता, जो व्यक्ति अपनी काबिलियत और जुगाड़ से एक ही जनपद में 20 साल तक राज किया, और जिसे सीएमएसडी स्टोर से हटाने की हिम्मत आज तक किसी सीएमओ ने नहीं की, अगर उन्हें कमजोर कहे जाने वाले सीएमओ डा. राजीव निगम ने हटाकर उनके स्थान पर भटटजी को बैठाया, तो चर्चा होनी ही हैं, भले ही सीएमओ ने आधा हटाया, लेकिन हटाया तो। सबसे अधिक चर्चा मिश्राजी को सिर्फ 15वां वित्त आयोग के पांच करोड़ के सामानों की खरीद फरोख्त से हटाने को लेकर हो रही हैं, और कहा जा रहा है, कि मिश्राजी को इस लिए 15वां वित्त आयोग से हटाया गया, ताकि वह इसके हिस्सेदार न बन सके। देश का यह पहला ऐसा सीएमओ का आदेश होगा, जिसमें चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र को सिर्फ 15वां वित्त आयोग के सामानों की खरीद फरोख्त से हटाया, यानि सीएमओ ने मिश्राजी को पूरी तरह से सीएमएसडी स्टोर से आजाद नहीं किया, अब जरा अंदाजा लगाइए, कि खरीद दूसरे चीफ फार्मासिस्ट भटटजी करेगें, और खरीदे गए सामानों को मिश्राजी प्राप्त करेगें, और अस्पतालों को भेजेगें।
कहा जाता है, कि सारा खेल तो सामानों की आपूर्ति और निर्गत में ही होती है। मिश्राजी आहत तो हुए हैं, और इसे देखते हुए यह लंबे अवकाश पर चले गए। मिश्राजी का यह कहना कि उन्होंने ही सीएमओ से 15वां वित्त आयोग से अलग करने की अपील की थी, जिसे मानते हुए सीएमओ ने हटा दिया। सवाल उठ रहा है, कि क्या मिश्राजी को 15वां वित्त आयोग से पांच करोड़ का बंदरबांट नहीं होगा? विभाग के कुछ लोग यह भी कह रहे हैं, कि सीएमओ साहब ने मिश्राजी को हटाकर एक संदेश दिया है, कि अन्य लोग भी सुधर जाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मिश्राजी को हटाने के पीछे किसकी साजिश हैं, इसमें आरसीएच, डा. एसबी सिंह, प्रेमबहादुर सिंह और एनएचएम के संदीप राय की भूमिका बताई जा रही है। वैसे सीएमओ कार्यालय में कौन किसका दोस्त हैं, और दुश्मन अंदाजा लगाना कठिन है। अगर मिश्राजी के दुश्मन हैं, तो प्रेमबहादुर सिंह के भी है। सबसे बड़ा सवाल तो सीएमओ साहब पर ही उठ रहा है, पूछा जा रहा है, कि क्यों इन्होंने मिश्राजी को आधा चोर माना क्यों नहीं पूरा चोर माना। अगर चोर न माने होते तो मिश्राजी को 15वां वित्त आयोग के पांच करोड़ के खरीद फरोख्त से अलग न करते। इसी लिए कहा जा रहा है, कि यह सारा खेल पांच करोड़ के बंदरबांट करने को लेकर हो रहा है, मिश्राजी को इस बजट से किनारे करना उन लोगों की साजिश मानी जा रही है, जो यह समझते थे, कि अगर मिश्राजी रहेगें तो उन्हें कमाने का मौका नहीं मिलेगा। जो लोग यह सोचते हैं, उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि बिना मिश्राजी की मर्जी के कोई एक रुपया भी नहीं कमा सकता है, क्यों कि सारी कमाई और हेराफेरी सामानों की क्वालिटी और उसकी क्वानटिटी पर निर्भर है, और मिश्राजी के पास अभी भी सीएमएसडी स्टोर का प्रभार है, और जब तक मिश्राजी नहीं चाहेगें, तब तक उनसे सीएमएसडी स्टोर का प्रभार कोई भी सीएमओ नहीं छीन सकता। सवाल यह भी उठ रहा है, कि जिस सीएमओ के आवास पर पांच करोड़ के बंदरबांट करने का खाका तैयार हो रहा था, उस समय मिश्राजी भी मौजूद रहे। फिर मिश्राजी को इस बंदरबंाट से अचानक अलग रखना चौकाने वाली बात है। वहीं पर सीएमओ कार्यालय एवं अनेक ठेकेदारों का कहना है, कि अगर सीएमओ साहब को मिश्राजी की बादशाहत समाप्त करनी ही थी, तो पूरी तरह क्यों नहीं समाप्त किया? क्यों आधा समाप्त किया? यही वह राज जिसे हर कोई जानना चाहता है। अब सीएमओ साहब के सामने सबड़े बड़ी समस्या टेंडर कराने की हैं, अगर टेंडर करा दिया तो सीएमओ को अनेक नेताओं, ठेकेदारों और अधिकारियों का कोपभाजन बनना पड़ सकता है, और अगर नहीं कराते हैं, तो जिले में रहना मुस्किल हो जाएगा, सीएमओ साहब अगर टेंडर कराते हैं, उनके हाथ में कुछ भी नहीं आएगा, और अगर नहीं कराते हैं, तो बहुत कुछ आएगा, न कराने का ही दबाव सीएमओ पर बन रहा है। जिले के सांसद और विधायक सीएमओ से यह नहीं पूछते कि क्यों नहीं टेडर करा रहे हैं, डीएम और सीडीओ भी जबाव तलब नहीं कर रहे है। पता नहीं क्यों कोई टंडर कराने का दबाव सीएमओ पर नहीं बनाता? क्यों लोग बिना टेंडर कराए काम देने पर जोर दे रहे है?
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