बस्ती। एमएलसी प्रतिनिधि हरीश द्विवेदी की शिकायत पर हो रही विजिलेंस जांच में जब सीएमओ डा. आरएस दूबे, अजय मिश्र, बाबू प्रेम बहादुर सिंह और संदीप राय ने फंसता हुआ देखा तो पत्रावली को ही गायब करवा दिया, कहा जा रहा हैं, अगर किसी के द्वारा पत्रावली कहीं मिल गई मिल गई तो जेल भी जाना पड़ सकता हैं, इस लिए इसके लिए नई रणनीति बनाई गई, तय हुआ कि कार्यालय में आगजनी करवा दिया जाए और बता दिया जाएगा कि पत्रावली तो मिल गई थी, लेकिन आग लगने से जल गई, अधिक से अधिक संस्पेड हो जाएगें, लेकिन जेल जाने से तो बच जाएगें, क्यों कि जिस तरह विजिलेंस की टीम और शिकायतकर्ता की सक्रियता देखी जा रही है, उससे आगजनी की घटना के होने की संभावना जताई जा रही है। मामला लगभग नौ करोड़ की हेराफेरी का है। अगर वर्तमान सीएमओ पत्रावली के गायब होने का एफआईआर खुद लिखवा देते हैं, तो सीएमओ काफी हद तक सेफ हो सकते है। विजिलेंस के एसपी को मांगने के बावजूद अगर कोई सीएमओ घोटाले से संबधित पत्रावली नहीं देता है, तो यह माना जाता है, कि घोटाले को छिपाने का प्रयास हो रहा है। जिन पत्रावली के गायब होने और जलाने की बातें कही जा रही है, उनमें 50 लाख की स्टेशनरी, 300 कर्मियों की नियुक्ति, जेम पोर्टल पर फर्नीचर की खरीद, बिना टेंडर का आर्डर दिया गया, यह आर्डर सुलतानपुर के ठेकेदार सुनील तिवारी और पीओ सीएल के शिवम अग्रवाल को दिया गया। 300 कर्मियों की नियुक्ति की पत्रावली बाबू प्रमोद कुमार मिश्र भी प्रेम बहादुर सिंह से मांग रहे हैं, लेकिन नहीं दे रहे है। वैसे सीएमओ को अब तक एफआईआर दर्ज करवा देना चाहिए था। अगर इसकी शिकायत न हुई होती तो इतने बड़े घोटाले पर से पर्दा षायद कभी न हट पाता। वैसे इस मामले में अगर कोई कार्रवाई होती है, जिसकी संभावना अधिक है, तो इसका सारा श्रेय हरीश सिंह को जाएगा, क्यों कि उनके प्रयास से ही यह जांच विजिलेंस टीम को दी गईं। वैसे इन्होंने शासन से खुली जांच कराने की मांग की थी। चीफ फार्मासिस्ट एवं स्टोर प्रभारी अजय मिश्र इस लिए फंस रहे हैं, क्यों कि यह जेम के कंसाईनी हैं, संदीप राय एएचआरएम के बाबू हैं, और प्रेम बहादुर सिंह राज्य बजट के बाबू। इन सभी ने मिलकर तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे के साथ मिलकर लगभग 90 फीसद का फर्जीवाड़ा किया।

सीएमओ कार्यालय में पत्रावली गायब होना या करा देना कोई नई बात हैं, इसकी शुरुआत एनएचआरएम घोटाले से षुरु हुई, जो अब तक जारी है। पत्रावली गायब होना या कार्यालय में आग लगा देना कोई नई बात नहीं हैं, इससे पहले सिडको कार्यालय को इस लिए जला दिया गया, ताकि घोटाले पर से पर्दा न उठ सकें। पत्रावली गायब होना और गायब होने का एफआईआर दर्ज कराना, घोटालेबाजों के लिए पुराना हथकंडा है, न पत्रावली रहेगी और न जांच होगा। पत्रावली का गायब होना या करवा देना उतना बड़ा अपराध नहीं होता, जितना पत्रावली का मौजूद रहना। एक पांच लाइन के एफआईआर में करोड़ों के घोटाले से अधिकारी और कर्मचारी बच जाते है। कल तक जो प्रेम बहादुर सिंह सीएमओ कार्यालय के हीरो और सर्वेसर्वा हुआ करते थे, आज प्रमोद कुमार मिश्र के आने के बाद उन्हें चोर की निगाह से देखा जा रहा है। सीएमओ कार्यालय में अब एक नई योजना बनी है। जिसमें एनएचआरएम के बाबू संदीप राय ने कह रखा है, कि गोरखपुर के बाबा उनके पार्टनर हैं, इस लिए एनएचआरएम के प्रिटिगं का सारा काम वहीं देखेगें, अजय मिश्र ने औषधि और उपकरण खरीद और बाबू प्रेम बहादुर सिंह का एकाधिकार सिविल, विधुत कार्य एवं राज्य बजट है। प्रदेश का सीएमओ कार्यालय पहला ऐसा कार्यालय होगा, जहां पर लोगों ने सरकारी धन को लूटने के लिए अपने-अपने काउंटर तय कर रखें। सीएमओ जिसकी सारी जिम्मेदारी होती है, उनके हिस्से में मात्र एक लाख में दस हजार ही आता है, 90 हजार बाबू और ठेकेदार का हो जाता, यह लांभास फर्जी आर्डर और कार्य का है। एक ठेकेदार ने सीएमओ से कहा भी कि साहब आप को तो 10 हजार ही मिलता है, 90 हजार तो बाबू और ठेकेदार खा जाते है। अब आप अंदाजा लगाइए कि अैंक बैलेंस किसका बढ़ेगा, सीएमओ का या बाबू का। रही बात ठेकेदार की तो उसे जितना भी मिल गया, उसी में खुष रहा। सीएमएस, फार्मासिस्ट और बाबूओं के द्वारा जो ठेकेदारों के साथ जो पार्टनरषिप का चलन चल गया, उससे पूरी व्यवस्था को ही पंगू बना दिया है। इस विभाग में वह ठेकेदार मक्खी मारता है, जिसके नाम अनुबंध हैं, और वह ठेकेदार मलाई काट रहा है, जिसके पास न तो हैसियत और चरित्र प्रमाण और पंजीयन तक नहीं है।