बस्ती। जो ब्राहृमण महासभा में हो रहा है, अगर इसी तरह चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा, जब इसका नाम भी कोई लेना नहीं चाहेंगा। जिस तरह से हेराफेरी के मामले सामने आ रहे है। अगर इसी तरह चलता रहा है, तो एक दिन मनरेगा के फर्जी मस्टरोल की तरह ब्राहृमण महासभा का हिसाब भी जीरो हो जाएगा। यह कैसा हिसाब-किताब हैं, जिसमें बिल, बाउचर, रसीद और बैंक स्टेटमेंट नहीं है। सवाल उठ रहा है, कि कैसे राष्टीय कार्यकारिणी के सदस्यों ने इसे मंजूर कर लिया, जबकि यही लोग बिल, बाउचर, रसीद के साथ बैंक स्टेटेमेंट की मांग कर रहे थे, ग्रुप में तो जो लोग अपने आप को बड़े सूरमा बनते थे, उन्होंने भी जांच कमेटी का विरोध नहीं किया, और यह तक नहीं कहा कि आखिर जांच कमेटी किस आधार पर बिना बिल, बाउचर, रसीद और बैंक स्टेटमेंट की जांच करेगी। जिस तरह अंकगणित की तरह हिसाब दिया गया, उसी को जोड़ घटाकर जांच कमेटी अपना मोहर लगा देगी। आखिर जांच कमेटी कैसे निर्णय लेगी कि दोषी कौन हैं? और कहां चोरी की गई, इस तरह की जांच में बिल, बाउचर, रसीद और बैंक स्टेटमेंट का होना जरुरी होता है, और इसे दिया ही नहीं गया, तो फिर जांच कमेटी बनाने का क्या औचित्य? आखिर ऐसे हिसाब-किताब की जांच कोई कमेटी कैसे करेगी? यह भी कहा जा रहा है, कि जिस तरह सरकारी कार्रवाई में अगर किसी जांच को लंबित करना होता है, या घोटाले को दबाना होता है, तो उसकी जांच के लिए तीन-चार सदस्यों की टीम बना दी जाती है, जितने भी मामले में जांच टीम बनाई गई, उनमें 90 फीसद से अधिक जांच रिपोर्ट ही शिकायतकर्त्ता को नहीं मिली, सालों हो जाते हैं, लेकिन जांच टीम अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाती। निष्पक्षता के नाम पर सालों से धन का बंदरबांट हो रहा है, उसके बाद भी न तो निष्पक्ष जांच हुई, और न निष्पक्ष कार्रवाई ही हुई, ऐसी निष्पक्षता का क्या मतलब जहां पर निष्पक्षता दिखाई ही न दे। जब निष्पक्षता दिखानी चाहिए थी, तो शीर्ष लोगों ने नहीं दिखाया, अगर चाहते तो 2016 में उस समय दिखा देते जब यह पता चला कि महामंत्री, ब्राहृमण महासभा की प्रापर्टी को अपने नाम लिखाने जा रहे थे, निष्पक्षता तो उस समय दिखानी चाहिए थी, जब लोगों ने साक्ष्य के साथ दिया कि महामंत्री ने दान के चेक को निजी के खाते में डाल दिया निष्पक्षता उस समय दिखानी चाहिए थी, जब महामंत्री ने दस लाख सूद पर दिया। लोग पूछ रहे हैं, कि यह कैसी संस्था है, जिसके लोग चंदा, पत्थर और चेक के नाम पर चोरी पर चोरी किए जा रहे हैं, फिर भी संस्था के जिम्मेदार मौन रहे। कौन करेगा इस ब्राहृमण महासभा पर विष्वास?

राकेश कुमार पांडेय ने स्पष्ट षब्दों में कहा कि कई दिनों से इस ग्रुप में ब्राहृमण महासभा से जुड़े अनेक गंभीर सवाल उठे, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला, लेकिन अध्यक्षजी चुप्प और मौन रहे। सवाल उठाया कि पिछले 25 सालों से इतने गंभीर आरोप लगाए गए और इस पर चर्चा तक नहीं हुई, कहा कि सबकुछ जानते हुए और इतने आरोपों के बाद भी अध्यक्षजी ने शंभूनाथ मिश्र को क्यों पुनः महामंत्री बनाया। यह एक ऐसा सवाल हैं, जिसमें सारे सवालों के जबाव छिपे हुए है। समाज में उठे सवाल और उसका निष्पक्ष जबाव मिलना चाहिए। कहा कि इससे पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रशांत पांडेय आरोप लगा चुके हैं, संस्था को व्यक्तिगत नाम कराने और महासभा को बेचने का प्रयास किया जा रहा है, कहा कि अगर अध्यक्षजी उस समय जांच करवा लेते तो आज ब्राहृमण महासभा सड़क पर न आती। जो सच छह साल पहले आ जाना जाना चाहिए, उसे आने से एक तरह से रोका गया, क्यों रोका गया? यह भी एक सवाल है। लिखते हैं, कि बाबाजी, समात के लोगों ने विष्वास के आधार पर संस्था के नाम पर इतनी बड़ी धनराशि दी, लोगों को विष्वास था,  िकइस संस्था के पदाधिकारी और जिम्मेदार व्यक्ति धनराशि और संपत्ति का सदुपयोग करेगें, दुरुपयोग नहीं करेगें। अंबिका पांडेय कहते हैं, कि पूर्वजों की अर्जित धरोहर किसी की मिलकियत नहीं बन सकती, ब्राहृमण महासभा सामूहिक विष्वास की अमानत है। अगर उय अमानत पर स्वार्थ की छाया पड़े तो सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि संस्था की आत्मा का हो जाता है। जहां सवाल दबाए जाते हैं, वहां सशंय जन्म लेता है, और जहां सत्य को निर्र्भीकता से सामने रखा जाता है, वहीं संस्था पुनः विष्वास अर्जित करती है। संस्था व्यक्ति से बड़ा होता और परम्परा पद से।