बस्ती। सरकारी अस्पतालों के साहब लोग इतने लालची होते जा रहे हैं, कि समझ में ही नहीं आ रहा है, कि यह लोग साहब हैं, या कोई गरीब, जिनके पास इतना भी धन नहीं रहता कि अंडा और मटन खरीद कर खा सकें। इन साहबों ने पैसे के लिए अपने स्तर को इतना नीचे गिरा दिया है, कि इन्हें टीबी के मरीजों का मटन और अंडा खाने से भी परहेज नहीं। इनका बस चले तो यह मरीजों का चावल, दाल, रोटी भी खा ले। लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा है, कि टीबी अस्पताल के सीएमएस और ठेकेदार मरीजों का अंडा और मटन भी खा सकते है। सरकार टीबी के मरीजों को जल्दी स्वस्थ्य होने के लिए उन्हें पौष्टिक आहार के रुप में पर्याप्त पैसा देती है। ताकि मरीज स्वस्थ्य होकर समाज और अपने परिवार में खुशी पूर्वक जीवन व्यतीत कर सके। वैसे भी टीबी अस्पताल में वही मरीज भर्ती होते हैं, जो आखिरी स्टेज के होते हैं, एक तरह से वह इस अस्पताल में इस लिए आते हैं, ताकि उनकी जिंदगी बच सके। जिदंगी बचने को कौन कहें, जिन मरीजों को महीनों साल जिंदा रहने की उम्मीद होती, उसे अस्पताल वालों के चलते दिनों में ही दुनिया छोड़कर चले जाते है। डाक्टरों का कहना है, कि टीबी का मरीज तभी ठीक हो सकता हैं, जब उसे पौष्टिक आहार मिले और सही तरीके से इलाज हो। कहते हैं, कि पौष्टिक आहार में डेली अंडा, दूध और मटन षामिल है। अगर किसी मरीज को यह तीनों पौष्टिक आहार डेली मिले तो उसका जीवन भी बच सकता है, और वह कुछ ही दिनों में घर वापस भी जा सकता है। दूध का मिलना तो मरीज ने बताया, लेकिन अंडा और मटन का मिलना नहीं बताया, कहा कि पहली बार सुन रहे हैं, कि सरकार हम लोगों को अंडा और मटन खाने के लिए पैसा भी देती है। कहा कि दो अंडें को कौन कहे, आज तक एक अंडा तक नहीं दिया गया, रही बात मटन की तो सूघंने को भी नहीं मिला। दाल, चावल, रोटी और सब्जी ही दिया जाता है। सवाल उठ रहा हैं, कि क्या कोई अंतिम स्टेज वाला टीबी का मरीज दाल, चावल, रोटी और सब्जी ठीक हो पाएगा, खाकर या फिर बच पाएगा? यह भी सवाल उठ रहा है, कि अगर किसी साहब या फिर ठेकेदार के घर का कोई टीबी का मरीज हैं, तो क्या उसे भी साहब और ठेकेदार दाल, सब्जी, रोटी और चावल ही खिलाएगें? जबाव न में ही रहेगा। बल्कि अधिक से अधिक पौष्टिक आहार देगें, ताकि उसके घर का मरीज जल्दी से जल्दी ठीक हो सके। जब एक साहब और ठेकेदार अपने घर के मरीज को जेब से पैसा लगाकर पोैष्टिक आहार दे सकते हैं, तो फिर अस्पताल के मरीजों को सरकार जो फ्री में पोैष्टिक आहार दे रही है, उसे क्यों नहीं दे सकते? तभी तो मरीज ने कहा भी है, कि अगर ‘साहब और ठेकेदार उसके हिस्से का पौष्टिक आहार खा ले रहे हैं, तो उन्हें पाप लगेगा, और नर्क में जाएगें। अगर साहबों और ठेकेदारों को पाप, पुण्य, नर्क और स्वर्ग का इतना ही ख्याल होता तो कभी कोई सीएमएस और ठेकेदार टीबी के मरीजों का अंडा और मटन न खाता। सवाल उन कमिष्नर, डीएम, सीडीओ पर भी उठ रहा है, जिन्होंने एक बार भी टीबी अस्पताल में यह देखने नहीं आए, या फिर निरीक्षण नहीं किया, कि मरीज को अनुमन्य भोजन मिल रहा है, कि नहीं? अगर एक बार भी देखे होते तो सीएमएस और ठेकेदार मरीजों का अंडा और मटन न खा पाते। इससे अधिक सवाल उन जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर भी उठ रहा है, कि आखिर इन लोगों ने क्यों नहीं अस्पताल का निरीक्षण किया, षायद इस लिए नहीं किया क्यों कि इनके ही ठेकेदार होते हैं, जो मरीजों का अंडा और मटन खाते और साहब को खिलाते। अंडा और मटन खाने का आषय उस धन से हैं, जो मरीजों के नाम पर आता है, और जिसे मरीजों को न खिलाकर आपस में बंदरबांट कर लिया जाता है। टीबी जैसे मरीजों का अंडा और मटन खाने वाले साहबों और ठेकेदारों की जितनी भी निंदा की जाए कम होगा।
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