बस्ती। विपक्ष के जनप्र्रतिनिधियों ने जनता को यह एहसास करा दिया कि इन लोगों ने हम्हें विधायक और सांसद बनाकर बहुत बड़ी भूल की है। सच तो यही है, कि जनता को अपनी गलती का एहसास विपक्ष के जनप्रतिनिधियों ने स्वंय अपनी क्रियाशैली से करा दिया। विपक्ष का नेता अगर सदन में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आम जनमानस से जुड़े मुद्वे को छोड़कर ‘पार्क’ की बात करे और सदन में ‘सोए’ तो समझ लेना चाहिए कि विप़क्ष के नेताओं को विकास से कोई लेना-देना नहीं हैं, विधायकजी को अगर सरकार से षहर के लोगों के लिए कुछ मांगना ही था, तो सीवर लाइन की मांग करते, कोई उधोग लगाने की बात करते, व्याप्त भ्रष्टाचार पर हमला बोलते, वाल्टरगंज और बस्ती चीनी मिल को पुनः चालू करने एवं बकाए का भुगतान करने की मांग करते, बेलगाम हो चुके जिले के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करते, अगर मांग ही करना था तो भाजपा के कथित भ्रष्ट जिला पंचायत अध्यक्ष, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्षों के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के जांच की मांग करते, तब जनता को अपनी गलती का एहसास नहीं होता। पता नहीं विपक्ष भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाता? ऐसा लगता है, कि मानो पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच कोई गुप्त समझौता या फिर कोई सौदा हो गया हो, अगर ऐसा नहीं होता तो विपक्ष के विधायक और सांसद बोर्ड की बैठक में भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा के जिला पंचायत अध्यक्ष का खुलकर बचाव करते नजर नहीं आते। जिन विपक्ष के विधायकों को जिला पंचायत अध्यक्ष के अनियमित कार्यो का विरोध करना चाहिए था, उन्होंने बचाव किया, भाजपा के लोग तो अपने ही पार्टी के अध्यक्ष पर हमला बोल रहे थे, लेकिन विपक्ष तमाशा देख रहा था। विपक्ष के विधायकों के इस रुप को देख भाजपा के लोग भी दंग रह गए, और कहने लगे कि जिला पंचायत अध्यक्ष ने विप़क्ष के विधायकों पर ऐसा कौन सा जादू कर दिया, जिससे सभी भीगी बिल्ली बन गए। सच मानिए, इस एक कांड ने विपक्ष के विधायकों की पोल खोल दी। जनता और मीडिया को समझ में ही नहीं आया कि आखिर विपक्ष के विधायकों को हो क्या गया? इस बचाव से विपक्ष के विधायकों को कितना और क्या लाभ हुआ, यह तो पता नहीं, लेकिन विधायकों और पार्टी की छवि को अवष्य नुकसान हुआ। कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष पूरी तरह सत्ता पक्ष के लोगों के सामने सरेंडर कर चुका है। एक तरह से उन्हें वाकओवर दे दिया। लोग तो यह भी कहने लगे कि सत्ता पक्ष का एक विधायक, विपक्ष के तीन विधायकों और सांसद पर भारी पड़ रहा है। इनसे अच्छा तो सत्ता के सहयोगी विधायक दूधराम रहें, जिन्होंने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि कौन कहता है, रामराज, रामराज नहीं बल्कि जंगलराज है। जो काम विपक्ष के इतने सूरमा मिलकर नहीं कर/करवा पा रहे हैं, उसे अकेले भाजपा के विधायक करवा ले रहें हैं। इसे विपक्ष की कमजोरी ही कही जाएगी, कि पीडब्लूडी विभाग के अधिकारी इनकी नहीं सुनते।

विपक्ष आज महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आम जनमानस से जुड़े मुद्वे की बात नहीं कर रहा है, बात इस बात की कर रहा है, कि फंला ने फंला को गाली दे दिया, बिरादरी के लोगों को गरिया दिया, विपक्ष ऐसी बाते कह रहा है, जिससे आम जनमानस से कोई सरोकार नहीं।  ऐसा लगता है, कि मानो विपक्ष, भाजपा की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार के मामले में समर्थन कर रहा हो। जिला लुटे या बर्बाद हो जाए, इससे विपक्ष के लोगों से कोई मतलब नहीं। विपक्ष का भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुखर न होना, घातक साबित हो सकता है। एक तरह से विपक्ष, सत्ता पक्ष की मुराद को चुप रहकर पूरा कर रहा है। विपक्ष के नेताओं को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जनता बार-बार गलती नहीं करेगी। रही बात इनके विकास करने की तो इनका विकास गेट लगवाने तक ही सिमट गया। इन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनता ने इन्हें विकास करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए जीताया, न कि गेट लगवाने के लिए। गेट लगवाने के मामले में सत्ता और विपक्ष के नेता दोनों एक ही नांव पर सवार है। कहना गलत नहीं होगा कि गेट लगवाने के मामले में नेताओं में कंपटीशन हो रहा है। कहने वाली बात नहीं कि गेट में ही सबसे अधिक बखरा मिलता। गेट लगवाने की परम्परा शुरु करने का श्रेय हर्रेया के विधायक को जाता है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि विपक्ष कब तक अपनी पार्टी की सरकार न होने का रोना रोती रहेगी। बस्ती जैसे जिले में अगर जनता ने सपा के एक सांसद और तीन विधायक को मौका देती और विपक्ष इतने दिनों बाद भी जनता की अपेक्षाओं पर अगर खरा नहीं उतरता तो इसके लिए जनता नहीं बल्कि वे नेता जिम्मेदार हैं, जो जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के बजाए निधियों को बेचने में लगे हुए है। विपक्ष माने या न माने 2027 उनके लिए अच्छा होने वाला नहीं है। जो आसार नजर आ रहे हैं, उससे सरकार बनाने का सपना इनका अधूरा ही रहने वाला है।