बस्ती। जनप्रतिनिधियों के निधियों को खरीदने और बेचने वाली चर्चित निर्माण कार्यदाई सिडको का नाम आते ही लोगों के जेहन में जिले को लूटने वाली कार्यदाई संस्था का नाम सामने आ जाता है। माननीयों की चहेती होने के नाते आजतक इसके एक्सईएन, एई और जेई के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। बस्ती मंडल के अखिलेख सिंह प्रदेश के पहले ऐसे कमिश्नर होंगें जिनके डीओ लिखने से तत्कालीन एक्सईएन आशुतोष द्विवेदी को उनके मूल विभाग यूपीआरएनएसएस यानि पैक्सपेड को वापस करना पड़ा। अब इन्हें फिर से वापस सिडको में सारे नियम कानून तोड़कर प्रतिनियुक्ति पर लाए जाने की खबर सामने आ रही है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस एक्सईएन के बारे में कमिष्नर यह लिख चुके हों कि यह स्वेच्छाचारी हैं, यह विभागीय कार्यो में कोई रुचि नहीं लेते, यह कार्यो के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही के प्रतीक है। यह भी लिखा कि इनकी संबद्वता समाप्त होने के बाद भी इन्हें इनके मूल विभाग में अभी तक नहीं भेजा गया। लिखा कि इनका कार्य व्यवहार भी पूरे मंडल में संतोषजनक नहीं हैं। प्रमुख सचिव समाज कल्याण को स्पष्ट लिखा कि इनके पद पर बने रहते से विभाग को आंवटित कार्यो पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। लिखा कि इनकी संबद्वता समाप्त कर किसी अन्य की नियुक्ति की जाए, या फिर एई को संपूर्ण कार्य का दायित्व सौंपा जाए। कमिश्नर ने यह डीओ तीन मार्च 25 को लिखा, और इनकी संबद्वता समाप्त करते हुए इन्हें आठ मार्च 25 को इनके मूल विभाग में वापस कर दिया गया।
बताते हैं, कि इनके तैनाती के दौरान सांसद और विधायक निधि के बजट का जमकर दुरुपयोग हुआ, बिना काम कराए माननीयों के चहेते ठेकेदारों को पूरा भुगतान किया गया। खासबात यह है, कि इनके कार्यकाल में एक भी प्रोजेक्ट पर सीआईबी लगा हुआ नहीं दिखाई दिखाई। सिडको के द्वारा ही गुणवत्ताविहीन आडिटोरिएम और जिले भर में मिनी इंडोर स्टेडिएम बनाए गए, भानपुर में तो निर्माणधीन गुणवत्ताविहीन मिनी इंडोर स्टेडिएम के सेटरिगं के चलते एक आदमी की मौत तक हो चुकी है। फिर कार्यदाई संस्था को न तो ब्लैक लिस्टेड किया गया और न एफआईआर ही दर्ज हुआ। इसका निर्माण सांसद निधि से हुआ। महादेवा विधानसभा में पुलिया ही ढह गया, फिर भी सिडको के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। भवन निर्माण चाहे कलेक्टेट का हो या फिर चाहे कमिश्नरी का हो, सभी के गुणवत्ता पर सवाल उठे, कलेक्टेट भवन तो एक बरसात भी नहीं झेल पाया, छत टपकने लगा था। सांसद और विधायक निधि से जिले में पिछले दस सालों में जितना भी सड़क या फिर भवन निर्माण हुआ, सभी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए, लेकिन माननीयों के दबाव के चलते डीएम और सीडीओ ने कोई कार्रवाई नहीं किया। जबभी कार्रवाई की बात उठती है, माननीयगण ढ़ाल बनकर खड़े हो जाते है। आप लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि आज तक एक भी माननीय ने सिडको के कार्यो की गुणवत्ता की न तो शिकायत किया और न जांच करने को लिखा, क्यों नहीं लिखा, कहने की आवष्यकता नहीं? जब भी किसी माननीय से पूछो तो कहते हैं, कि उनका काम काम प्रस्ताव देना है, गुणवत्ता को देखना नहीं, यह काम डीआरडीए का है।
जिस भ्रष्टाचारी एक्सईएन आशुतोष द्विवेदी को कमिश्नर के लिखने पर उनके मूल विभाग को वापस भेज दिया गया हो, अगर उसी भ्रष्टाचारी को वापस नियम विरुद्व फिर से संबद्व किया जाएगा तो सरकार और विभाग के एमडी पर सवाल तो उठेगा ही। विभाग की साजिश का खुलासा करते हुए भाजपा के मंडल मंत्री मनीश कुमार पांडेय ने 17 फरवरी 26 को अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण को कमिश्नर का डीओ पत्र को शासनादेश की प्रति उपलब्ध कराते हुए लिखा कि इस मामले में शासनादेशो की अवहेलना की जा रही है। कहा कि स्पष्ट आदेश है, कि अगर किसी अधिकारी को एक बार उसकी संबद्वता समाप्त करते हुए उसके मूल विभाग में वापस भेजा जा चुका है, तो पुनः उसकी नियुक्ति प्रतिनियुक्ति पर नहीं की जा सकती। अगर किसी कारण प्रतिनियुक्ति पर भेजना आवष्यक है, तो उस अधिकारी को पहले अपने मूल विभाग में दो साल तक सेवा देनी होगी। लेकिन इन्होंने मात्र दस माह की सेवा दी है। लिखा कि इनकी जन्म तिथि के अनुसार इनका रिटायरमेंट 31 मई 27 है। इस प्रकार इनकी कुल सेवा ही एक साल दो माह बची है, और सेवा निवृत्ति के छह माह पहले सारे वित्तीय अधिकार सीज करने का प्रावधान है। शिकायतकर्त्ता ने बताया कि यह सबकुछ अनैतिक धन का कमाल है, बताया कि चूंकि सिडको में सिर्फ माननीयों की निधियों की लूट ही होती है, गुणवत्तापरक काम से किसी को कोई मतलब नहीं होता। कहा कि सिडको के अधिकारियों का मन सांसदगण और विधायकगण ने बढ़ाया, अगर यह लोग अपने निधि के प्रति सक्रिय होते तो सिडको के अधिकारी बिना काम कराए करोड़ों का भुगतान न करते।
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