बस्ती। बादशाही अखाड़ा एवं मानसरोवर की यात्रा करने वाले देश के पहले सिख सरदार कुलवेंद्र सिंह ने उत्तर प्रदेश सिक्ख गुरूद्वारा प्रबंधक सीमित के सामने ज्ञानियों की समस्याओं और उनकी आर्थिक स्थित एवं परिवार के ठीक से भरण-पोषण को लेकर आवाज उठाया, कहा कि सिख समाज की सेवा करने वाले ज्ञानियों की वर्तमान स्थित ठीक नहीं है। कहा कि हम लोगों के घरों में तो चार-पांच एसी हैं, लेकिन ज्ञानियों के पास ढंग का कूलर तक नहीं है। सवाल करते हैं, कि समाज का हर वर्ग तरक्की कर रहा है, तो फिर ज्ञानी और उनका परिवार क्यों नहीं कर रहें है? इनके बच्चे आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे है? ज्ञानीजी लोग अपने बच्चे को एक अच्छी शिक्षा तक नहीं दे पा रहे है। जबकि सिख समाज के बच्चे विदेशो में शिक्षा ग्रहण कर रहे है। आर्थिक तंगी और व्यवस्था के अभाव में ज्ञानीजी लोग एक गुरुद्वारा में अधिक दिन तक सेवा नहीं दे पा रहे हैं, जैसा कि कंपनीबाग के गुरुद्वारा के ज्ञानी। कहा कि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को ज्ञानियों और उनके परिवार की समस्यों को लेकर गहन विचार करना चाहिए। सरदार कुलवेंद्र सिंह का समर्थन करते हुए गांधीनगर गुरुद्वारा के ज्ञानी सरदार प्रदीप सिंह कहते हैं, कि सिख समाज और उनके बच्चे जिस तरह तरक्की कर रहे हैं, उसी तरह की तरक्की करने का अधिकार ज्ञानी और उनके बच्चों को भी हैं, सवाल करते हैं, कि जिस समाज की रात दिन ज्ञानी सेवा करते हैं, उस समाज को ज्ञानियों की सामाजिक स्थित को भी सुदृढ़ करने का जिम्मा उठा चाहिए, आखिर ज्ञानी के पास आय का कौन सा ऐसा स्रोत हैं, जो वह अपने परिवार और बच्चें को आज की सारी सुख और सुविधा उपलब्ध करा सके। ज्ञानियों के परिवार के सामने हेल्थ की सबसे बड़ी समस्या हैं, इनके परिवार का कोई हेल्थ बीमा भी नहीं होता ताकि आवष्यकता पड़ने पर ठीक से परिवार और खुद का इलाज करा सके। कहा कि 326 वर्षों को तो मैं नहीं जानता, लेकिन 50-55 वर्ष से होश संभाला है, सिक्ख धर्म के अनुयाइयों में बहुत बदलाव आया है। यह बदलाब जैसा की हम देख रहे हैं कि वर्ष 1984 के बाद सिख अपने सिख धर्म से विमुख होता जा रहा है। इसका मुख्य कारण जो मेरी समझ में आया है कि ग्रंन्थी साहिब जी ( ज्ञानी जी ) महराज जी की कमी। सिख धर्म में सबसे ज्यादा आवश्यकता ग्रंथी साहिबजी ज्ञानी जी महराज की होती है, जो कि गुरु ग्रंथ साहब के सचिव सेकेट्री कहे जाते हैं, जो अत्यंत आदरणीय तथा धार्मिक होते हैं। ग्रंन्थी साहबजी महाराज गर्भधारण होने से मृत्यु होने के बाद तक सभी नामकरण, आनंद कराज, अंतिम अरदास या किसी भी किस्म के शुभ कार्यों व दुःखों में काम आते हैं। ग्रंथी साहिब जी वह सम्मानित व्यक्ति होतें है जो गुरुद्वारा साहब जी में स्थापित जीवित आत्मा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महराज के ब्रम्ह मुहूर्त से रात तक सभी प्रकार के सिख मार्यदा के अनुरूप पाठ-पूजा, अर्चना, धार्मिक अनुष्ठानों व सिक्ख शास्त्रों के ज्ञाता और हमारे मार्गदर्शक होतें है। सिखों के लिए श्रीगुरु ग्रंथ साहिब जी केवल एक ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि हम सब के जीवित गुरु साहिब जी महाराज की प्रतिदिन सुबह प्रकाश और रात में सुख आसन की मर्यादा को पूर्ण करते हैं। ग्रंथीजी ज्ञानीजी महाराज संगत को सिखों के गुरुओं का ज्ञान संस्कृत और धर्म से जोड़ते हैं। ज्ञानीजी गुरुद्वारा के पवित्रता और धार्मिक नियमों को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ज्ञानी जी संगत की तरफ से मन्नत संकट श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सामने अपने प्रिय वचनों व सुंदर तरीके से अरदास करते हैं उनके बिना हमारा कोई काम नहीं होता है‌। यहां यह भी जानना जरूरी है कि ज्ञानी जी लोगांे का पारंपरिक जन्म पर आधारित व वंशज ग्रंथी भी नहीं होते हैं। ग्रंथी जी महाराज का पद केवल ज्ञान, सेवा व अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त करते हैं। सुझाव के रुप में कहा कि जंहा ज्ञानीजी को घर-घर जाकर अपने तनख्वाह इकट्ठा करना पड़ता हैं। तय शुदा बेहतरीन रकम श्री गुरुद्वारा साहिब जी से होनी चाहिए, सुबह किसी के यहां नाश्ता व लंगर करते हैं। नाश्ता व लंगर के लिए गुरूद्वारा साहब में मय राशन व सभी सुविधाएं के साथ किचन होनी चाहिए। शाम व रात में किसी के यहां लंगर करना, भी एक अपमानजनक कार्य है। चूंकि सरदार पप्पू ने इस तरह की समस्या पहली बार उठाया तो कमेंट लाजिमी है। अगर इसी तरह की आवाज सभी जनपदों से उठने लगें तो ज्ञानीजी और उनका परिवार न तो पेट भरने के लिए किसी के यहां लगंर और नाष्ता करने नहीं जाएगें, और इनके परिवार को भी वह सुख और सुविधा मिल सकेगी, जिसके यह हकदार भी है। जब इस मामले में उ.प्र. सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के हेड हरगोंविद सिंह लाड से ज्ञानियों के विकास के लिए जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि इस मामले में हमारी बात पप्पू सरदार से हो चुकी हैं, जल्द ही इस मामले में मीटिगं बुलाई जाएगी।