बस्ती। सरकार को अब उर्दू अनुवादक की तरह अंग्रेजी अनुवादक की भी नियुक्ति करनी चाहिए, क्यों कि राजस्व के अधिकांश अधिकारियों को अग्रेंजी ही नहीं आती हैं, जिसके चलते साहब निर्णय नहीं ले पा रहे है। ऐसा ही एक मामला सदर तहसील का सामने आया हैं, अधिवक्ता प्रदीप चंद्र पांडेय जब नायब तहसीदार के सामने 1905 का अंग्रेजी में लिखा हुआ रजिस्टर्ड बैनामा ले गए, तो नायक साहब ने पहले दिन तो वकील साहब से कुछ नहीं कहा, दूसरे दिन भी कुछ नहीं कहा, लेकिन तीसरे दिन जब वकील साहब ने कहा कि नायब साहब कब आर्डर करेगें, तब हिचकिचाते हुए एनटी साहब ने वकील साहब से कहा कि बुरा न मानिएगा, आप का आर्डर इस लिए नहीं हो पा रहा है, क्यों कि यह अंग्रेजी में लिखा हुआ है, और हमको अंग्रेजी आती नहीं, अगर आप इसका हिंदी अनुवाद करवा कर दे दें तो निर्णय हो जाएगा, वरना ऐसे ही पड़ा रहेगा। मुवक्किल ने वकील साहब को मेहनताना तो दिया, लेकिन हिंदी अनुवाद करने का पैसा नहीं दिया, जिसके चलते साल भर हो गए, कोई निर्णय नहीं हो पाया। वकील साहब जितनी बार एनटी के पास जाते उतनी बार एनटी ही वकील साहब से पूछ लेतें कि अनुवाद कराकर लाए कि नहीं? अब सवाल उठ रहा है, कि एनटी साहब निर्णय कैसे करें, या रिपोर्ट कैसे लगाएं? रिपोर्ट तभी लगेगा जब एनटी को हिंदी अनुवाद मिलेगा। असलियत तो यह है, कि अगें्रजी न आना तो एक बहाना है, मुवक्किल की कंजूसी के चलते मामला एक साल से नायब साहब की आलमारी में धूल खा कर रहा है। एक सच और भी हैं, चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा हुआ है, इस लिए कोई भी इसमें हाथ नहीं डालना चाहता। एनटी साहब सोचते हैं, जब कमिष्नर, डीएम और एसडीएम ने निस्तारित नहीं किया तो हम क्यों करें?

यह मामला चर्च से जुड़ा हुआ है। लगभग एक साल पहले चर्च आफ इंडिया सीआईपीबीसी के बाबी विलिएम ने प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखा, जिसमें चर्च की प्रापर्टी को एक ऐसे चर्च आफ नार्थ इंडिया सीएनआई के अनिल लाल के द्वारा अवैध रुप से दुकान निर्माण करवाकर बेचे जाने के बारे में लिखा, जिसे सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक करार दे चुका है। प्रमुख सचिव ने  कमिश्नर को जांच कर कार्रवाई करने का आदेश दिया, कमिश्नर ने मामला सुप्रीम कोर्ट का जब देखा तो उन्होंने जांच डीएम को सौंप दिया, डीएम ने भी वहीं किया जो कमिष्नर ने किया, उन्होंने भी खुद न जांच करके एसडीएम सदर को सौंप दिया। एसडीएम सदर ने भी वहीं किया, जो डीएम ने किया, उन्होंने भी खुद न जांच करके तहसीलदार के रहते जांच नायब तहसीलदार को सौंप दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि जो जांच राजस्व के सबसे बड़े अधिकारी कमिष्नर को करनी चाहिए वह जांच राजस्व के सबसे छोटे अधिकारी को सौंप दिया गया। प्रमुख सचिव का कमिश्नर को आदेश दिए लगभग एक साल हो गए, लेकिन अभी तक जांच पूरी नहीं हुई, और इस बीच निर्माण भी हो गया और दुकान बिक भी गया। ऐसा लगता है, मानो चर्च की संपत्ति से प्रमुख सचिव से लेकर  कमिश्नर, डीएम और एसडीएम कोई लेना-देना नहीं है। किसी को इस बात की परवाह नहीं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा हुआ, हर कोई पल्ला झाड़ रहा है। अधिवक्ता प्रदीप कुमार पांडेय का कहना है, कि सब पैसे का खेल हैं, चूंकि हमारा मुवक्किल पैसे से कमजोर हैं, और विपक्ष चर्च की संपत्ति बेच-बेचकर बड़ा आदमी बना हुआ है, मेरे मुवक्किल के सारे आवेदन विपक्ष पैसे से दबवा दे रहा है। सबका झुकाव चर्च की प्रापर्टी बेचने वालों पर है।