बस्ती। 68 लाख की ठगी के आरोप में रेड स्टार अस्पताल के मालिक शेंलेंद्र कुमार उर्फ राणा और एसबीजी के मालिक प्रमेंद्र कुमार एवं इनकी पत्नी रिंकी निवासी मलिक पुरवा, केसरी प्रसाद और एसबीजी ग्लोबल कंपनी के फाउंडर अनिल यादव के खिलाफ कोतवाली में पीड़ित अविनाष चौधरी पुत्र स्व. विधा सागर चौधरी ने केस दर्ज कराया है। इस ठगी में रेड स्टार अस्पताल के पूरे परिवार का शामिल होना काफी चर्चा का विषय का विषय है। चार गुना लाभ के चक्कर में अविनाश चौधरी, अभिषेक कुमार गुप्त, सौरभ कुमार श्रीवास्तव, अभिषेक कुमार, श्याम श्रीवास्तव, यष चौधरी, शिवम गुप्त सहित अन्य ने कर्ज लेकर, जमीन बेचकर और गहना बेचकर एवं गाढ़ी कमाई का 68 लाख रुपया जमा किया, चार गुना मुनाफा कौन कहे, ठगबाजों ने जब पैसा मांगा तो इन सभी पर एससीएसटी का मुकदमा दर्ज करवा दिया। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्यों लोग खासतौर पर व्यापारी वर्ग चार-पांच गुना मुनाफा कमाने के चक्कर में जिंदगीभर की जमा पूंजी लगा देते हैं? जब कि रोज इस तरह की घटनाओं का खुलासा मीडिया की ओर से किया जा रहा है। उसके बाद भी लोग ठगी का शिकार हो रहे है। हैरान करने वाली बात यह है, कि जब भी इस तरह के ठगी का मामला सामने आता है, तो पूरा परिवार शामिल रहते मिलता है। इसका मतलब यह हुआ कि ठगी में पूरा परिवार शामिल रहता है, परिवार को ठगबाज इस लिए शामिल करते हैं, ताकि लोगों को ईमानदार होने का एहसास कराया जा सके। इसी के झांसे में निवेशकर्त्ता यह सोचकर आ जाता है, कि अगर किसी कारोबार में पूरा परिवार शामिल है, तो वह बेईमान नहीं हो सकते। निवेशकर्त्ता यह नहीं जानते कि यह सब ठगने का एक तरीका है। एक बात और सामने आ रही है, कि अधिकतर ठगी का शिकार होने वाले और ठगने वाले दोनों स्थानीय होते है। लोग यह भी सोचकर पैसा लगा देते हैं, कि घर के हैं, जाएगें कहां। यही विष्वास निवेशकर्त्ताओं के बर्बादी का कारण बनता है। एक कारोबारी को अच्छी तरह मालूम रहता है, कि दुनिया में कोई भी ऐसा कारोबार नहीं जो कुछ ही दिनों में एक लाख का पांच लाख कमाकर देगी। फिर भी फंस जाते है। खुद तो फंसते ही है, अपने दोस्तों को भी फंसा देते है। इस मामले में यही हुआ। अविनाश कुमार चौधरी तो खुद बर्बाद हुए, और अपने साथ अभिषेक कुमार गुप्त, सौरभ कुमार श्रीवास्तव, अभिषेक कुमार, ष्याम श्रीवास्तव, यश चौधरी, शिवम गुप्त को भी बर्बाद कर दिया, एससीएसटी का मुकदमा अलग से झेलना पड़ रहा है, और यह सबकुछ चार गुना मुनाफा पाने के चक्कर में हुआ। एक और भी महत्वपूर्ण बाते सामने आ रही है, जब भी इस तरह निवेशकों को ठगा जाता है, तो पहले विष्वास जमाने के लिए लाभ का चार गुना दे दिया जाता है, इसी लालच में निवेशक खुद तो गहना और जमीन बेचकर पैसा लगाता है, साथ ही अपनों का भी लगवा देता है। जब दूसरी बार चार गुना लाभ लेने की बारी आती है, तो या तो कंपनी फरार हो जाती हैं, या फिर लाभ देने में आनाकानी किया जाता है, तब मजबूर में एफआईआर दर्ज करवाना पड़ता है, तब तक ठगबाज किसी और जनपद में जाकर निवेशकों के पैसे से ऐश करता है। इस मामले में तो पहले चरण में 15 फीसद लाभांश दिया गया। वह भी बिना इन्वेस्ट किए। जब ठगबाजों को यह लगता है, कि उनका ठगने का टारगेट पूरा हो गया तो सबकुछ समेटने में लग जाते है, और तब तक निवेशकों को काफी देर हो जाती है। रही बात एफआईआर लिखाने की तो जब मामला पुलिस में चला जाता है, तो ठगबाजों के लिए और भी आसान हो जाता है, क्यों कि पुलिस उतना ईमानदारी से काम नहीं करती जितना करना चाहिए, जिसका लाभ ठगबाजों को मिलता है, और जब मामला काफी पुराना हो जाता है, तो पुलिस चुपके से एफआर लगा देती है। किसी को पता भी नहीं चल पाता।
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