बस्ती। अवकाश के दिन यानि रविवार को दिनभर खूनखराबा और मारपीट होता रहा। किसी के हाथ टूटे तो किसी का सिर फटा तो किसी का पैर टूटा। कहने का मतलब कोई अपने घर सही सलामत नहीं गया, पहले अस्पताल गए, मरहम पटटी करवाया, उसके बाद घर गए, वह भी अपने पैरो पर चलकर बल्कि वाहन पर गए। खूब कानून को हाथ में लिया गया। पता नहीं कितना लीटर खून बह गया होगा, अगर यही खून दान कर दिया होता तो न जाने कितने की जांन बच जाती। इससे पहले कभी भी मारपीट के इतने मुकदमें नहीं लिखे गए। सोनहा, कोतवाली, छावनी, गौर, पैको लिया, कलवारी, कप्तानगंज, लालगंज एवं दुबौलिया थाने में और कोई काम नहीं हुआ, सिर्फ मारपीट के मुकदमें दर्ज किए। उक्त थानों में घायलों की भरमार रही। 37 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। सबसे अधिक हर्रैया के ग्राम शेरवाडीह में आठ लोगों को नामजद किया गया। जितने भी मारपीट के मुकदमें दर्ज किए गए, उनमें पुरानी अदावत के रहे। जमीन जायदाद को लेकर भी झगड़े हुए, लाडियां चली, लोग घायल हुए। चूंकि रविवार को अपकाष का दिन होता है, इस लिए लोग घर पर ही रहते हैं, और कोई काम तो रहता नहीं, इस लिए सोचते हैं, कि चलो इसी बहाने विरोधियों को सबक सिखा आएं है। इसी सबक सिखाने के चक्कर कई लोगों को जेल भी जाना पड़ेगा, मुकदमा लिखने से न जाने कितने नवयुवकों का भविष्य अलग से बर्बाद होगा। इस तरह के झगड़े की शुरुआत भददी-भददी गालियों से ही होती है। ऐसी-ऐसी गालियों का बौझार होता है, जितना कभी पूरे जीवन में नहीं हुआ होगा। पुलिस का मानना हैं, कि जब भी मारपीट की घटना होती है, उसमें लोग इतने गुस्से में रहते हैं, कि इसी के चलते न चाहते हुए भी जान तक चली जाती है। कहते हैं, कि जो समस्या का हल आपसी बातचीत से निस्तारण हो जाना चाहिए, वह मारपीट का रुप लेलेता है। पहले के लोग अपनी अधिकतर समस्या चौपाल में प्रधानजी के जरिए ही सुलझ जाते थे, लेकिन जब से अधिकांष प्रधान भ्रष्ट हो गए, कोई उनके पास तक यह जानकर नहीं जाता कि यह क्या समस्या का निस्तारण करेगा, जो खुद भ्रष्टाचार में शामिल हैं। ऐसा लगता है, कि मानो किसी को नियम कानून पर भरोसा ही रहा, कानून को हाथ में लेकर मुजरिम बनते जा रहे है। लोगों के भीतर इतना गुस्सा समाता जा रहा है, कि कोई बर्दास्त करने को तैयार नहीं। बात-बात में जिस तरह लोग गुस्से का इजहार करने लगते हैं, उसी का नतीजा मारपीट है। हालांकि अनेक लोगों को तब सही और गलत समझ में आता है, जब एफआईआर दर्ज हो जाता है। फिर उसके बाद कोर्ट कचहरी और थाने का चक्कर शुरु हो जाता है। वकील साहबों को काम भी मिल जाता है। पता नहीं कई ऐसे मारपीट के मामले होते हैं, जिसे पुलिस मुकदमा ही नहीं दर्ज करती। जिस तरह जमीन के मामले में हिंसक घटनाएं हो रही है, उसे देखते हुए लोगों को संयम बरतने की सलाह दी जा रही है, और कहा जा रहा है, कि परिवार को अगर बर्बादी और मुसिबत से बचाना है, तो समझदारी से काम लेना चाहिए। मारपीट करना किसी का हल नहीं, इस मारपीट में कभी-कभी लोगों की जानें भी चली जाती है। कहां भी जाता हैं, जान से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती हैं, दौलत चली जाती हैं, तो उसे वापस लाया जा सकता है, लेकिन अगर किसी की जान चली गई, तो दुनिया भर की दौलत काम नहीं आता।
रविवार को विभिन्न थानों में मारपीट के नौ मुकदमें लिखे गए, जबकि अन्य के चार। इसी से कहा जाता है, कि रविवार का दिन मारपीट वाला रहा। सोनहा थाना के पिटाउट में जमकर मारपीट हुई। पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। कोतवाली क्षेत्र में कृष्णा मिशन अस्पताल के पास लाडियां चली। तीन व्यक्ति पर केस दर्ज हुआ। छावनी के रेड़वल में हुए मारपीट में चार, गौर के कटास के झगड़े में दो, पैकोलिया के बस्थनवा में चार, कलवारी के दौलतचक में छह, कप्तानगंज के दुबौला में दो, लाजगंज के ढ़ढौरा में पांच और हर्रैया के शेरवाडीह के मारपीट में आठ सहित कुल 37 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। जो अपने आप में एक रिकार्ड है। ऐसा लगता है, कि मानो पुलिस को रविवार के दिन काफी सावधान रहना पड़ेगा।
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