बस्ती। बस्ती में जनगणना के कार्यं लगाए गए, 17 तकनीकी सहायकों को आउटसोर्स करने वाली श्रृगंवेद बिल्डिलर्स प्रा. लि. लखनऊ सरकार से तो प्रति तकनीकी सहायक के पेतन के नाम पर हर माह 25 हजार ले रही है, लेकिन उन्हें 19610 रुपये ही दे रही है, इस तरह एक कर्मचारी से 4490 रुपये का घोटाला कर रही है। नियम विरुद्व 18 फीसद जीएसटी और 3088 रुपया और ईएसआई का 642 रुपया काट ले रही है, इतना ही अपना मुनाफा भी कर्मचारी के वेतन से काट ले रही है। जबकि नियमानुसार 25 हजार तक मानदेय पाने वाले जीएसटी और ईएसआई नहीं काटा जा सकता। हैरान करने वाली बात है,  िकइस फर्म को भुगतान भी 25हजार के दर से हर माह चार लाख 16 हजार 333 रुपये का हो रहा है, भुगतान के सापेक्ष यह कर्मचारियों को तीन लाख 23 हजार 487 रुनया ही दे रही है। अब सवाल उठ रहा है, क्यों नहीं फर्म अनुबंध के अनुसार कर्मवारियों को भुगतान कर रही हैं? और क्यों डीएम की ओर से भुगतान करने की अनुमति दी जा रही है। सवाल उठ रहा है, जब किसी कर्मचारी का जीएसटी नंबर ही नहीं तो वह रिफंड कैसे जीएसटी लेगा? इस घोटाले को उजागर करने वाले नगर पंचायत हर्रैया के चेयरमैन कौषलेंद्र सिंह ने करते हुए डीएम को पत्र लिखकर उनसे जीएसटी की वापसी करवाने और भुगतान करने वाले दोषी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है, साथ ही जीएसटी और ईएसआई की हेराफेरी करने वाली फर्म को ब्लैक लिस्टेड करने की भी मांग की है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि डीएम के साथ किए गए करार में फर्म लिखा है, कि वह कर्मचारी के मूल वेतन से कोई कटौती नहीं करेगी, तो फिर क्यों डीएम को गुमराह करके जीएसटी और ईएसआई की चोरी फर्म कर रही है। यह फर्म न सिर्फ बस्ती में बल्कि अन्य जनपदों में भी हेराफेरी कर रही है, गलती हेराफेरी करने वाली फर्म की नहीं बल्कि भुगतान करने वाले तहसील की है। अब हर हर चीज की जानकारी तो डीएम को होती नहीं, कहने का मतलब कोई फर्म जो भी बिल बनाकर दे देगी, तहसील वाले उसका भुगतान कर देंगें? दिन रात मेहनत करने वाले जनगणना कर्मचारियों को अगर उन्हें 25 हजार भी नहीं मिलेगा, और उनके वेतन की चोरी कर ली जाएगी, तो उनका मनोबल टूट ही जाएगा। वैसे भी इस 25 हजार की नौकरी के लिए लाख-दो लाख देना पड़ा होगा। डीएम मैडम को चेयरमैन साहब के पत्र को गंभीरता से लेना होगा, और उन्हें कर्मचारियों को उनका हक दिलाना होगा। देखा जाए तो कोई भी सर्विस प्रोवाईडर ईमानदारी से काम नहीं कर रहा है, हर कोई चोरी कर रहा है, और अधिकारी चोरी होने दे रहे है। गलती सर्विस प्रोवाइडर की नहीं बल्कि भुगतान करने वाले विभाग के अधिकारियों की है, और अधिकारी तभी आंख बंदकर भुगतान पर हस्ताक्षर करेगा, जब उन्हें उनका हिस्सा मिल जाता। हिस्सार मिलने के बाद यह कुछ भी नहीं देखते। इन्ही लालची अधिकारियों के चलते सर्विस प्रोवाइडर मनमानी करते हैं, जितना चाहते उतना मानदेय देते है। बहरहाल, देखिए, मैडम चेयरमैन साहब के पत्र पर क्या निर्णय लेती है।