बस्ती। पहले सपाईयों पर गुंडई के बल पर जमीन और मकानों पर कब्जा करने का आरोप लगता रहा, जिसके चलते सपा सत्ता में वापस नहीं लौट पाई, अब वही काम भाजपाई कर रहे हैं, और कहा जा रहा है, कि अगर भाजपाईयों का रर्वैया इसी तरह गुंडई करने का रहा तो भाजपा का हर्ष सपा जैसा हो सकता है। जिस तरह आजकल कानून को हाथ में लेकर नेता गुंडई करने पर अमादा हो गए हैं, उसे लेकर कई सवाल उठने लगें हैं, पूछा जा रहा है, कि जब सत्ता पक्ष का जिम्मेदार नेता ही गुंडई करने लगेगा तो आम जनता का क्या होगा? कैसे आम जनता और उसका परिवार सुरक्षित रहेगा? तब सपा और भाजपा के शासनकाल में फर्क क्या रह जाएगा? वैसे यह सवाल तो पिछले कई सालों से उठ रहा था, लेकिन एक दिन पहले जिस तरह गोसेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेश शुक्ल अपने लोगों को साथ में लेकर पत्रकार विपिन बिहारी के तुरकहिया स्थित आवास पर धमके, और कानून को अपने हाथ में लेकर गाली गलौच और महिलाओं के साथ दुर्व्यव्हार किया, पत्रकार को धक्का दिया और जमीन में गाड़ देने जैसी भाषा वाला वीडियो वायरल हुआ, उसने इस सवाल को फिर हवा दे दिया। शुक्लाजी को शायद यह नहीं मालूम होगा, कि इनके विरोधी इस घटना के जरिए अपनी पुरानी राजनैतिक दुष्मनी को साधने के फिराक में लगें हुए है। इन्हें नीचा दिखाना चाहते है। इसे राजनीति का रुप देने का प्रयास कर रहे है। इसी बहाने इनके विरोधी, शुक्लजी के राजनैतिक भविष्य पर हमला बोलने की तैयारी कर रहे हैं। इस घटना के बाद इनके विरोधी इतने सक्रिय हो गए, कि इन्हें खुद मालूम नहीं होगा। इसका एहसास इन्हें तब होगा, जब इनके विरोधी अपने मकसद में कामयाब हो जाएगें। इस घटना के बाद शुक्लजी के विरोधी लामबंद होने लगें हैं, लखनऊ को तो छोड़िए बात दिल्ली तक पहुंचाई जा रही है। अगर कहीं शुक्लजी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गया तो कहानी कुछ और होगी, शुक्लाजी के राजनैतिक कैरियर पर एक धब्बा लग सकता है। विरोधी भी चाहते हैं, कि एफआईआर दर्ज हो, क्यों कि इसी में उन लोगों को शुक्लजी के राजनैतिक कैरियर की बर्बादी नजर आ रही है। वैसे इस घटना की सभी निंदा कर रहे हैं, और कह रहे हैं, इस तरह की घटना अगर कोई आम व्यक्ति अंजाम देता तो उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी चर्चा शुक्लजी के कारण हो रही है। मीडिया पहले भी कह और बता चुकी हैं, कि इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं बड़ा रुप ले सकती है। लोग यह भी सवाल कर रहे हैं, कि जब शुक्लजी उस जमीन का मालिकाना हक अभी तक साबित ही नहीं कर पाए तो कैसे यह जमीन उनके की मानी जाएगी? जमीन तो उसी की ही मानी जाएगी, जिसने जमीन का बैनामा कराया। किसी के नाम मात्र यह कह देने कि जमीन उसकी हैं, से नहीं माना जाएगा, और न ही गुंडई के बल पर ही हासिल किया जा सकता है। चूंकि यह मामला जमीन से जुड़ा हुआ है, इस लिए मालिकाना हक साबित करने के लिए अभिलेखों की आवष्यकता पड़ती है। जो कि अभी तक शुक्लजी ने विपिन बिहारी ़त्रिपाठी को न तो उपलब्ध कराया और न दिखाया ही। अगर इसी तरह जबरिया जमीन हासिल हो सकती है, तो फिर हर कोई इस आसान रास्ते को अपनाना चाहेगा। फिर नियम कानून और सुशासन का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। चूंकि षुक्लजी को योगीजी का करीबी माना जाता है, इस लिए हो सकता है, कि एफआईआर न दर्ज हो, अगर एफआईआर दर्ज नहीं हुआ तो अगुंली सीधे योगीजी पर उठेगी। पुलिस भी इस हाईप्रोफाइल मामले में जल्दबाजी करना नहीं चाहेगी, पुलिस का पूरा प्रयास होगा, कि मामला आपसी समझौते से निपट जाए, और इसी तरह सदेंष भी मिला होगा। अब सवाल उठ रहा है, कि क्या पीड़ित परिवार शुक्लजी के साथ एक टेबुल पर बैठने को तैयार हैं, परिवार पहले ही किसी समझौते से इंकार कर चुका है। परिवार के लोगों का कहना है, कि जिस व्यक्ति ने उनके परिवार को अपमानित किया, गाली गलौज किया, घर की महिलाओं को अपषब्द, दुर्व्यव्हार किया, उस व्यक्ति के साथ कोई समझौता नहीं होगा, कहते हैं, कि समझौता किस बात का, जब जमीन हमारी हैं, अपमानित भी हमारा परिवार हुआ है, और समझौता भी हम्हीं करें। कहते हैं, कि इस घटना के बाद से उनका पूरा परिवार डरा और सहमा हुआ महसूस कर रहा है। दूसरी तरफ शुक्लजी के सामने समझौता ही एक मात्र रास्ता रह जाता है। इसी लिए कहा भी जाता हैं, कि दुष्मनी भी उस हद तक करो कि कभी आवयष्कता पड़े तो काम आ सके। यह घटना उन नेताओं के लिए एक सबक जो सत्ता के नशें में चूर होकर कानून का हाथ में लेते है। किसी भी सत्ताधारी नेता को सत्ता और पैसे के नशे में इतना चूर नहीं होना चाहिए, कि वह इंसा नही न सके। यह पहली बार नहीं हैं, जब नेताजी ने पत्रकार पर हमला नहीं किया, इससे पहले पूर्व सांसद और वर्तमान विधायक भी हमला कर चुके है। यह वे लोग जो नेता बनने से पहले चाय की दुकान पर चाय पिलाने वाले का इंतजार करते है। बहुत कम ऐसे पत्रकार होगें जिनकी पृष्टि भूमि अपराधी और बदमाश की हो, लेकिन यहां पर तो अधिकांश नेताओं की पृष्टि भूमि अपराध से भरा हुआ है। ऐसे पृष्टि भूमि वाले नेता जब पत्रकारों पर हमला करते हैं, तो खुद का इतिहास बना देते है।