बस्ती। डाक्टरों पर हाथ उठाने या फिर उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त चेतावनी दी है। कहा कि अगर डाक्टर ही सुरक्षित नहीं रहेगें तो मरीज कैसे सुरक्षित रह सकते है। इस लिए डाक्टरों का सुरक्षित रहना आवष्यक हैं, कहा कि अगर डाक्टर से कोई गलती हो भी जाती है, तो वह इसकी शिकायत कर सकते हैं, जांच करवा सकते हैं, लेकिन किसी को भी यह अधिकार नहीं हैं,  िकवह डाक्टरों के साथ मारपीट करे, या फिर उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए, अगर इसके बाद भी कोई कानून अपने हाथ में लेता है, तो उसे दस साल की सजा भुगतने को तैयार रहना होगा। जमानत भी नहीं होगी, अगर हाईकोर्ट ने ऐसे मामलें में आरोपी को जमानत दे भी दिया तो सुप्रीम कोर्ट उस जमानत को निरस्त कर देगी। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों का यह निर्णय मुंबई के डोमीवली की एक घटना को लेकर सामने आया। इस घटना में षिवसेना के पार्षद नवीन की हाईकोर्ट से मिली जमानत को निरस्त करते हुए पार्षद से जबाव तलब किया है। इस मामले में पुलिस ने डाक्टर की तहरीर पर पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया था, और पांचों के खिलाफ पुलिस की ओर से आरोपपत्र भी न्यायालय में दाखिल किया गया। घटना नौ जुलाई 26 की है। हाईकोर्ट की ओर से पांचों को जमानत मिल गई थी, जिसे पीड़ित डाक्टर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। जहां पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्णय देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को डाक्टरों पर हाथ उठाने या फिर उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है। कहा कि हम यह निष्चित करना चाहते हैं, कि डाक्टर सुरक्षित रहंे, कहा कि स्वास्थ्य सुरक्षा की यह पहली षर्त हैं, कि डाक्टर सुरक्षित रहें। इसके लिए केंद्र और राज्य स्तर पर कानून बनाए गएं है। इस कानून के तहत सजा के साथ हर्जाना देने का भी प्राविधान है। आजकल जिस तरह सरकारी और गैरसरकारी अस्पतालों के डाक्टरों के साथ हिंसक घटनाएं हो रही है, और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मिल का पत्थर साबित होने वाला हैं। अमूनन ऐसे मामलों में अधिकांष डाक्टर अपमान का खून पीकर चुप हो जाते है। क्यों चुप हो जाते है, यह बहुत बड़ा सवाल है। कहना गलत नहीं होगा कि अधिकांष डाक्टरों को नियम कानून की ही जानकारी नहीं रहती। जिन लोगों ने इस तरह के मामलों में नियम कानून का सहारा लिया, उनकी जीत हुई, और हंगामा करने वालों को नुकसान उठाना पड़ा। अक्सर देखा गया है, कि ऐसे मामलों में अधिकाश डाक्टर समझौता करने लगते है। ऐसा करने से उन लोगों को बढ़ावा मिलता है, जो छोटी-छोटी बात पर हंगामा कर ब्लैकमेल करने लगते है। आईएमए और पीएमएस को भी इस मामले में कार्यषाला का आयोजन करना चाहिए, और उन्हें नियम कानून की जानकारी देनी चाहिए। डाक्टरों को समझौता करने के बजाए एकता और मजबूती दिखाना होगा। कानून तभी साथ देगा, जब कोई कानून के चौखट पर जाएगा, जबकोई चौखट पर जाएगा ही नहीं तो कानून कैसे अपना काम करेगा, और कैसे उन लोगों को सजा देगा, जिन्होंने कानून को अपने हाथ में लिया।