बस्ती। जिला होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी अशोक कुमार सिंह को चार डाक्टरों ने यूंही बंधक नहीं बनाया, चारों डाक्टरों के खिलाफ एफआईआर के बाद स्थित और भी खराब होने की आशंका जताई जा रही है। जब घटना के बारे में जानने का प्रयास किया तो पता चला कि डीएचओ की कार्यशैली से जिलेभर के डाक्टर्स इतने परेशान हो चुके थे कि काम करना मुस्किल हो रहा था, डाक्टर्स घुटन महसूस कर रहे थे, डीएचओ का बार-बार डाक्टर्स को अपमानित करना और उनकी बातें न सुनना और लिखा पढ़ी करना, किसी को अवकाश न देना, अवकाश को रिजेक्ट कर देने से स्टाफ से लेकर डाक्टर्स इतने दुखी और परेशान रहते थे, कि उन लोगों ने प्रमुख सचिव और निदेशक को शपथ-पत्र के साथ लिखकर दे दिया था, कि हम लोग डीएचओ के साथ काम नहीं कर सकते। क्यों कि इनका व्यवहार और कार्यशैली इतनी खराब हैं, कि हर कोई इनसे असंतुष्ट रहता है। जिला होम्योपैथिक चिकित्सालय जिला अस्पताल के डा. संतोश कुमार दूबे का कहना है, कि हम लोग पिछले तीन साल से इनके द्वारा मानसिक और आर्थिक रुप से प्रताड़ित किया जा रहा है। कोई न कोई रोज बहाना बनाकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है, चतुर्थ श्रेणी से भी स्पष्टीकरण मांगा जाता, अगर कोई डाक्टर्स या अन्य स्टाफ सीसीएल या सीएल लेने जाता तो त्वरित रिजेक्ट कर देते, रिजेक्ट करने से पहले यह तक जानने का प्रयास नहीं करते, कि क्यों कोई ईएल या सीएल ले रहा है। कहते हैं, कि डीएचओ एक तरह से जिलेभर के होम्योपैथिक के डाक्टर्स और स्टाफ का गार्जिएन होता है, अगर गार्जिएन से अपनी बात नहीं करेगा तो किससे करेगा, लेकिन जब भी इनसे कोई बात करो सुनने का तैयार नहीं, और जब कोई गार्जिएन सुनेगा ही नहीं तो उसका असंतुष्ट रहना लाजिमी है, कहते हैं, इनकी कार्यशैली को लेकर मुख्य चिकित्साधीक्षक बस्ती मंडल ने भी इन्हें कार्यशैली और व्यवहार में सुधार लाने के लिए लिख चुके हैं, फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ। बताया कि दवा न होते हुए भी इन्होंने 2025 में विभागीय बजट को सरेंडर कर दिया। चिकित्सा प्रतिपूर्ति का भी भुगतान नहीं देते। कहा कि पिछले तीन सालों से इनका असहयोगपूर्ण रर्वैया रहा। जिस अधिकारी के भीतर कार्य करने की और निर्णय लेने तक की क्षमता न हो, वह अधिकारी कैसा होगा, समझा जा सकता है। एक भी डाक्टर्स और स्टाफ इनके कार्य व्यवहार से संतुष्ट नहीं है। कहा कि 14 अगस्त 26 को घटना वाले दिन भी सभी डाक्टर्स डीएचओ साहब से यही कह रहे थे, कि पहले हम लोगों की बाते सुन लीजिए, फिर कोई काम करिए। लेकिन यह कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे, और जब आप तीन साल तक बात नहीं सुनेगें तो गुस्सा आना लाजिमी है। मारपीट और बंधक बनाए जाने की घटना को लेकर पूरी तरह इंकार किया। एफआईआर दर्ज होने के बाद सभी डाक्टर्स 17 अगस्त 26 को निदेशक से मिलने गए थे, और इन लोगों ने उनके सामने पूरी बाते रखी और कहा कि हम लोग ऐसे अधिकारी के साथ में काम करने को तैयार नहीं, जो किसी की सुनता ही न हो। कहा कि इस मामले में जिले भर के डाक्टर्स और उनका संगठन एक साथ है। एफआईआर दर्ज कराने को लेकर कहा कि पहले जांच होनी चाहिए थी, उसके बाद एफआईआर होना चाहिए था। कहते हैं, कि अगर आवष्यकता पड़ी तो हम सभी डाक्टर्स एक साथ अवकाश पर भी जा सकते है। कहते हैं, कि डीएचओ के रहने से नुकसान ही नुकसान हुआ। डीएचओ साहब अवकाश पर चले गए।