बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब डीएम और डिप्टी सीएम मैनेज होते रहेगें, तो कार्रवाई किस पर होगी? भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा? स्वास्थ्य विभाग में पिछले दो तीन सालों से सोैदेबाजी और मैनेज का खेल जिले से लेकर प्रदेश स्तर पर हो रहा है, इससे सरकार की छवि और सरकारी धन का कितना नुकसान हो रहा हैं, इसका अंदाजा सौदेबाजी करने वाले नेता और अधिकारी नहींे लगा सकते है। सीएमओ डा. आरएस दूबे एवं डा. राजीव निगम और बाबू प्रेमबहादुर सिंह, संदीप राय, आकाश पांडेय, प्रमोद कुमार मिश्र एवं बजरंगी जैसे अन्य इस लिए बचते आ रहे हैं, क्यों कि इन्हें अच्छी तरह मालूम हैं, कि स्थानीय स्तर पर डीएम और प्रदेश स्तर पर डिप्टी सीएम उन्हें बचा ही लेगें, जिस अधिकारी और बाबू में यह भावना घर कर जाए, वह अधिकारी और बाबू को भगवान भी चाहें तो नहीं सुधार सकतें। सबसे अधिक हैरानी डिप्टी सीएम/स्वास्थ्य मंत्री के भ्रष्ट आचरण को देखकर होती है। हर्रैया महिला अस्पताल और बस्ती महिला अस्पताल में नौ करोड़ का फर्जीवाड़ा डिप्टी सीएम खुद पकड़ते हैं, बजट पर रोक लगाते और जांच का आदेश देते हैं, लेकिन जब जांच और कार्रवाई करने की बारी आती है, तो मोटी रकम लेकर सीएमएस डा. सुषमा जायसवाल और डा अनिल कुमार को बरी कर देते हैं, और जब दोनों सीएमएस बरी हो गए, तो बाबू भी बरी हो गए। लोगों को लगा था, कि इस मामले में दोनों सीएमएस पर अवष्य गाज गिरेगी, लेकिन गाज गिरने को कौन कहे, आज भी दोनों भ्रष्ट सीएमएस वही जमे हुए हैं, जहां जमे थें। सीएमओ भले ही हट गए, लेकिन दोनों सीएमएस और बाबू नहीं हटे, इससे बड़ा भ्रष्टाचार का सबूत और नहीं मिल सकता। बाबू इस लिए भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार करता है, क्यों कि वह अच्छी तरह जानता है, कि सीएमओ साहब अपने आप को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, डीएम तक को मैनेज कर सकते है, और जब सीएमओ बच जाएगें, तो बाबू अपने आप बच जाएगा। बाबू अगर प्रेमबहादुर सिंह, प्रमोद कुमार मिश्र, आकाश पांडेय और बजरंगी जैसा हो तो बात ही क्या? सीएमओ और सीएमएस को भ्रष्ट बनाने वाला और कोई नहीं बाबू ही होता है। साहब भी अच्छी तरह जानते हैं, कि अगर उन्हें अपना टारेगेट पूरा करना है, तो वह बिना बाबू के नहीं कर सकते, अगर ऐसा नहीं होता तो सारे नियम कानून तोड़कर प्रेम बहादुर सिंह को पांच साल से एक ही पटल पर न रहने देते, और प्रमोद कुमार मिश्र को गोरखपुर से बस्ती न लाते, जब कि इन दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना चाहिए था, एक का फर्जी मृतक आश्रित पर नियुक्ति करने और दूसरे पर नीता यादव की जांच रिपोर्ट में गबन का दोशी पाए जाने पर, लेकिन फिर वही सवाल उठ रहा है, कि अगर इन दोनों के खिलाफ एफआईआर होता तो दोनों सीएमओ के खिलाफ भी होता, जिस तरह जिले में एफआईआर न लिखने के नाम पर सौदेबाजी हो रही है, उसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। जब भी स्वास्थ्य विभाग में कोई बड़ा घपला होता और जब उसकी जांच होती है, तो सीएमओ और बाबू इस लिए बच जाते हैं, क्यों कि पत्रावली पर डीएम और सीडीओ का अध्यक्ष और सचिव के रुप में अनुमोदन रहता है। जिस दिन अनुमोदन करने वाले डीएम और सीडीओ के खिलाफ कार्रवाई होने लगेगी, उस दिन एनएचआरएम से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, तब डा. बृजेष शुक्ल और बाबू संदीप राय फर्जीवाड़ा नहीं कर पाएगें। कहना गलत नहीं होगा, कि जिले में एनएचआरएम को बर्बाद करने में डीएम और सीडीओ का आंख बंदकर अनुमोदन करना माना जा रहा है।
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