बस्ती। जो लोग अधिकारियों को ईमानदारी का तमगा देतें हैं, उन्हें सबसे पहले थानों और तहसीलों में जाकर उन पीड़ितों से मिलना और पूछना चाहिए, कि क्या आप लोगों को न्याय मिला कि नहीं? क्या आप की एफआईआर दर्ज हुई? क्या आप की खतौनी ठीक हुई? यकीन मानिए सच जानने के बाद किसी का मन और दिल यह नहीं गवारा करेगा, कि वह अधिकारियों को ईमानदारी का तमगा दें। अगर इसके बाद भी कोई ईमानदारी का तमगा देता है, तो यह माना जाता हैं, कि वह या तो अधिकारियों की चापलूसी कर रहा है, या फिर उसे कुछ खोने का डर हो। यह सवाल इस लिए उठ रहा है, क्यों कि हाल ही में एक प्रेस वार्ता में एक भगवाधारी नेता ने सिर्फ दो अधिकारियों के बारे में कहा कि दोनों बहुत ईमानदार है। इसका मतलब यह निकाला गया, कि बाकी अधिकारी ईमानदार नहीं है। जब कि यह सवाल उनसे किसी ने पूछा भी नहीं था, और न ही इसे कहने की आवष्यकता ही थी, फिर भी अधिकारियों को ईमानदारी का तमगा दे दिया। बताइए इसे आप क्या मानेगें? जिन अधिकारियों को ईमानदारी का तमगा दिया गया, उन्हें भी अच्छी तरह मालूम होगा कि वह इस लायक नहीं हैं, उन्हें भी यह लगा होगा, कि उनकी चापलूसी की जा रही है। क्यों कि वर्तमान परिवेश में जिस तरह हर काम में राजनैतिक दखलंदाजी बढ़ रही है, और अधिकारी चाहकर भी पीड़ितों के साथ न्याय नहीं कर पा रहंे, उससे अधिकारियों को यह लगता होगा, कि वह ईमानदारी के तमगा के लायक नहीं है। जिस तरह आज के पत्रकारों को ईमानदार कहना एक तरह से पत्रकारिता को गाली देने जैसा माना जाता है, ठीक उसी तरह अगर कोई नेता, अधिकारियों को ईमानदारी का तमगा देते हैं, तो उन्हें भी वही माना जाता है, जो पत्रकारों के बारे में कहा जाता है। सार्वजनिक रुप से अगर कोई नेता किसी अधिकारी को ईमानदारी का तमगा देने की बातें करता है, तो जनता उस नेता को चापलूसी करने वाला  वाला नेता मानती है। जिस तरह अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी जरुरतमंदों का शोषण और उत्पीड़न कर रहे हैं, उसे देख कर ही पीड़ित व्यक्ति जब थाना और तहसील से निकलता है,  तो यह कहते हुए सुना जाता है, कि अधिकारी और कर्मचारी ने उसे मिलकर लूट लिया। थाना और तहसीलों में सबसे अधिक पीड़ित रोते और बिलगते हुए देखे जा सकते है। दोनों विभागों में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है, कि एक आम आदमी पिस कर रह जा रहा है, उसे न्याय नहीं मिल रहा है, बल्कि न्याय के नाम पर उसका उत्पीड़न किया जा रहा है। सवाल उठ रहा है, कि डीआईजी, डीएम और एसपी ईमानदार होकर भी क्या करेगें, जब उनके अधीनस्थ ही ईमानदार नहीं होगें। किसी अधिकारी को ईमानदारी का तमगा देने का मतलब पूरे विभाग को क्लीन चिट देना माना जाता है। सवाल उठ रहा है, कि क्या अधीनस्थ ईमानदार हैं? अगर नहीं है, तो फिर उस विभाग के अधिकारी को ईमानदारी का तमगा देने का क्या मतलब? कहीं दूर मत जाइए, लगभग 20-25 दिन हो गए, तुरकहिया में गोसेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेष षुक्ल और पत्रकार विपिन त्रिपाठी के बीच जमीन को लेकर विवाद हुआ। दोनों तरफ से एफआईआर के लिए तहरीर दी गई, लेकिन आज तक एफआईआर दर्ज नहीं हुआ, जब कि यह मामला कमिष्नर, डीआईजी, डीएम और एसपी के संज्ञान में है। ऐसे में अगर इनमें से किसी अधिकारी को कोई ईमानदारी का तमगा देता है, तो तमगा देने वालों को आप कहेंगें? जब योगीजी को ईमानदारी का तमगा नहीं मिल सकता तो अधिकारियों को कहां से मिलेगा। कोई अधिकारी विशेष के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन समूह के लिए नहीं, और जब तक समूह की नजर में अधिकारी अच्छा नहीं होगा, तब तक वह ईमानदारी के तमगे का अधिकार नही।