बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्यों सबसे अधिक गाली कलम और भगवान के पुजारी को ही मिल रही है। आखिर इसकी कौन सी वजह है, कि समाज की सबसे अधिक सेवा करने वाले पत्रकार और ब्राहृमण को वही समाज गाली दे रहा है, जिसके लिए दोनों वर्ग न जाने कितने सालों से सेवा करते आ रहें है। तो फिर क्यों इन्हें गालियां मिल रही है? क्या यह दोनों वर्ग कर्त्तव्य से अधिक धन और लालच को महत्व देने लगे है? पत्रकार इस लिए गाली खाकर रहा है, क्यों कि अधिकांश लोग किसी न किसी दरबार के दरबारी हो गए है? ब्राहृमण इस लिए गाली खा रहा है, क्यों कि जो समाज में उनकी छवि थी, उसे उन्होंने धूमिल कर दिया। ऐसा लगता है, कि मानों पत्रकारों को गाली देने का रिवाज बन गया हैं, पत्रकार सही भी लिखे तब भी गाली पाए और गलत लिखे तब भी गाली पाए, न लिखे तब भी गाली पाए। ठीक उसी तरह ब्रहृमण को सही रहने पर भी गाली मिल रही है। देखा जाए तो दोनों वर्गो का षोषण भी सबसे अधिक हो रहा है। इतना शोषण होने के बावजूद भी दोनों वर्ग समाज को अपनी सेवाएं दे रहें हैं। लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यही दोनों ऐसा वर्ग हैं, जिसे समाज को सबसे अधिक आवष्यकता पड़ती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, कि कुछ लोगों ने कभी शोषण किया होगा, लेकिन उनके पुरखों की सजा उनके बच्चों को क्यों गाली खाने के रुप में भुगतनी पड़ रही है।
सोचने वाली बात यह है, कि आज समाज, क्यों पत्रकारों और ब्रहृमणों को ही अधिक गाली दे रहा है, इसके पीछे क्या कारण है? जब कि समाज इन्हीं दोनों वर्ग को अपना अभिन्न अंग भी मानता है। अब तो जनप्रतिनिधि भी दोनों वर्गो को गाली देने लगे हैं। पत्रकारों और ब्राहृमणों को गाली देना लगता है, कि एक फैश न सा बनता जा रहा है। कुछ लोगों का मानना और कहना है, कि जब कोई वर्ग अपनी राह से भटक जाता है, तो गाली मिलना स्वाभाविक है। इसका मतलब यह हुआ कि दोनों वर्ग अपनी राह से भटक गएं है। सभी लोग तो नहीं भटके, लेकिन गाली तो खानी ही पड़ रही है। चंद लोगों के भटकने का खामियाजा दोनों वर्गो को भुगतना पड़ रहा है। जाति व्यवस्था की असमानता के कारण उत्पन्न गुस्सा ब्राहृमण वर्ग पर केंद्रित हो गया, क्यों कि ब्राहृमण को सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का संचालक माना जाता रहा है। देखा जाए तो पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होते हैं, जब भी पत्रकार सत्ता, सरकार और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सवाल करता या भ्रष्टाचार को उजागर करता तो भ्रष्टाचारियों के समर्थक गाली देने लगते है। बहुजन समाज, दलितों, शोशितों और वंचितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के नाम पर सबसे अधिक सुलभ और आसान ब्राहृमण ही होता है, क्यों कि लोग मान बैठे हैं, कि ब्राहृमणों ने ही षोषण किया होगा। जबकि ऐसा बिलकुल ही नहीं है। भले ही समाज के कुछ लोगों ने गलत किया होगा, लेकिन 90 फीसद ब्राहृमण आज भी समाज की सेवा ठीक उसी प्रकार कर रहा है, जिस तरह पत्रकार कर रहा है। इस सच को ठुकराया नहीं जा सकता कि दोनों वर्गो ने समाज को बहुत कुछ दिया, और यह भी सत्य हैं, कि कुछ लोगों ने गलत भी किया। किसी को भी गाली देने से पहले यह सोचना होगा कि जिसे वह गाली दे रहे हैं, या देने जा रहे हैं, वह भी समाज का एक अंग है। गाली देना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, समाधान तो आपसी भाईचारा और प्यार से होता। प्यार दीजिए और प्यार पाइए।
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