बस्ती। आज जिले भर में चर्चा इस बात की हो रही है, कि विधायकजी ने जीएसटी में कमीशन मांगकर सही किया या गलत? जो जानकार लोग हैं, या फिर यह कहिए कि जो जीएसटी की चोरी करते हैं, उन लोगों का कहना रहा कि विधायकजी ने जीएसटी में कमीशन मांगकर कुछ भी गलत नहीं किया, क्यों कि विधायकजी उन्हीं ठेकेदारों से जीएसटी में कमीशन मागें होगें, जो जीएसटी की चोरी करते हैं। सवाल के लहजे में कहते हैं, कि जब ठेकेदार विधायक निधि में जीएसटी की चोरी कर सकता हैं, तो विधायकजी क्यों नहीं अपना हिस्सा मांग सकते? दिनभर लोग इस बात की जानकारी लेते रहें कि आखिर वह कौन सा ऐसा दिमागदार और होषियार विधायकजी हैं, जिनका दिमाग जीएसटी में कमीषन मांगने में पहुंच सकता है। कुछ लोगों ने नाम लेकर कहा कि यह काम उसी विधायक का होगा। जिले के लोगों के लिए इससे बड़ा दुभार्ग्य और क्या हो सकता है, कि आज वह इस बात की चर्चा कर रहें है, कि विधायकजी ने जीएसटी में कमीशन मांगकर सही किया या गलत। जहां विधायकों के अच्छे कार्यो की चर्चा होनी चाहिए, वहीं विधायक के चोरी और बेईमानी की चर्चा वे लोग कर रहे हैं, जिन्होंने विधायक बनाया। आज तक विधायक निधि के बेचने और 50 कमीषन लेने की जितनी चर्चा नहीं हुई, उतना जीएसटी में कमीशन मांगकर हुई। सवाल उठ रहा है, कि इतनी गोपनीय बात मीडिया तक आई कैसे? जाहिर सी बात हैं, उसी ठेकेदार ने वायरल किया होगा, जो विधायकजी के शोषण और उत्पीड़न का शिकार हुआ होगा। इस तरह की गोपनीयता तभी भंग होती है, जब कोई जनप्रतिनिधि कमीशन मांगने की सीमा को लांघने का प्रयास करतें है। विधायक बनाने वाली जनता कभी सोच भी नहीं सकती कि उसका विधायक इतना बड़ा कमीषनबाज निकलेगा कि वह जीएसटी में भी कमीषन मांगेंगा। जिस दिन ठेकेदार ने जीएसटी में कमीशन मांगने वाले का नाम वायरल कर दिया, उस दिन विधायकजी जनता को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। जनता की नजर में जनप्रतिनिधियों की छवि इतनी खराब हो चुकी हैं, कि कोई उनका नाम सम्मान से लेना भी नहीं चाहता। कमीशन ने जनप्रतिनिधियों को इतना नीचे गिरा दिया है, कि अगर कोई उठना भी चाहे, तो नहीं उठ सकता। यही कारण है, कि जब ऐसे लोग चुनाव हारते हैं, तो जनता को कोई अफसोस नहीं होता, बल्कि इस बात की खुषी होती है, कि चलो इसी बहाने कमीषनखोर जनप्रतिनिधि से पीछा तो छूटा। अगर जनप्रतिनिधि का ठप्पा न लगा रहे तो बगल से गुजर जाएगें, लेकिन कोई नमस्कार भी नहीं करेगा। जनप्रतिनिधि बनने से पहले इनके आवासों पर कोई छापा नहीं पड़ता, लेकिन जनप्रतिनिधि बनने के कुछ ही सालों बाद इनके घरों में देष की सबसे बड़ी एजेंसियों का छापा पड़ने लगता है। प्रदेश की जनता ने ऐसे छापे न जाने कितने जनप्रतिनिधियों के आवासों पर पड़ते सुना और देख चुकी है। जनता बार-बार यह जानना चाहती है, कि आखिर एक जनप्रतिनिधि को कितना पैसा चाहिए, कि वह चोरी चमारी और बेईमानी से तोबा कर लें। एक तरह से जनप्रतिनिधियों को जनता के विकास के नाम पर आए धन को पांच साल तक उपयोग/दुरुपयोग करने का लाइसेंस मिल जाता है। इसी लिए जो जनप्रतिनिधि चोरी बेईमानी में पांच साल बीता देते हैं, जनता उनका अगले पांच साल के लिए नवीनीकरण नहीं करती। ठेकेदारों के द्वारा जीएसटी चोरी करने के बारे में एक ठेकेदार ने बताया कि सभी ठेकेदारों को माह के 20 तिथि तक जीएसटी जमा कर देना होता हैं, लेकिन जो ठेकेदार जीएसटी की चोरी करते हैं, वह फार्म में भुगतान षून्य दिखाते है। जबकि उनके फर्म को भुगतान हुआ। यही सिलसिला साल भर तक चलता रहता है, और हर माह ठेकेदार भुगतान को षून्य दिखाता रहता है। चूंकि ठेकेदार को ही 18 में 16 फीसद जीएसटी जमा करना होना है। इस लिए जीएसटी की चोरी करने वाले ठेकेदार आसानी से लाखों रुपये के जीएसटी की चोरी कर लेते हैं, अगर इनमें आधा यानि आठ फीसद जनप्रतिनिधि को ठेकेदार कमीशन दे देता है, तो भी ठेकेदार का आठ फीसद बचता है। इस तरह करोड़ों के भुगतान पर ठेकेदार 16 फीसद के जीएसटी की चोरी करता है, और आठ फीसद अपने आका को दे देता है। एक करोड़ में 16 लाख का लाभ मामूली नहीं होता। ऐसे में अगर किसी विधायक ने जीएसटी की चोरी करने वाले ठेकेदार से जीएसटी में कमीशन मांग लिया तो बुरा क्या किया? एह सप्ताह पहले बनकटी के सूसापार में जीएसटी वालों ने एक फर्म को चार करोड़ के जीएसटी की चोरी करते पकड़ा। लाखों रुपये की रिकवरी का आदेष भी हुआ।