बस्ती। जिले को पहली बार ऐसा एआर कोआपरेटिव मिला, जिसने ज्वाइन करते ही समितियों के सचिवों से कहा कि अगर एक रुपया भी निर्धारित दर से अधिक खाद बेची गई, तो जेल जाने को तैयार रहें। चूंकि ऐसा फरमान सुनने के आदी सचिव लोग नहीं रहें, इस लिए विरोध स्वरुप नए पुराने और घिसे पिटे मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए, चूंकि किसी एआर ने पहली बार सचिवों के भ्रष्टाचार पर सीधा हमला किया, इस लिए सचिव लोग तिलमिला गए। इससे पहले सचिवों ने कभी भी किसी एआर के भ्रष्टाचार के खिलाफ न तो आवाज उठाया और न कभी हड़ताल पर गए। क्यों नहीं गए, क्यों कि पूर्व के एआर इन लोगों के भ्रष्टाचार को रोकने के बजाए बढ़ावा देते थे, दोपहर से एआर के चेंबर और कार्यालय में सचिवों का जमावड़ा होने लगता था, और वहीं पर यह तय होता था, कि कैसे धान, गेहूं और खाद में भ्रष्टाचार किया जाए। कहने का मतलब जैसे एआर वैसे सचिव। भ्रष्ट सचिवों ने जैसे चाहा वैसे धान, गेहूं और खाद में लूटपाट किया। कोई रोकने वाला नहीं रहा, प्रशासन भी एक तरह से इनके आगे सरेंडर करता आ रहा। इन लोगों ने किसानों और आरकेवीवाई एवं 10 लाख के ऋण सीमा के धनराशि को संगठित गिरोह की तरह लूटा। सरकार से पैसा तो खाद का कारोबार करने के लिए लिया, लेकिन उस पैसे को नीजि कारोबार में लगा दिया, ऋण देने वाला जिला सहकारी बैंक देखता रह गया। इसके चेयरमैन, एआर सहित डीएम को लिखते रहे, कि आरकेवीवाई का धन हड़पने वाले सचिवों के खिलाफ मुकदमा कायम किया जाए, लेकिन किसी ने कोई भी कार्रवाई नहीं किया, जिसका नतीजा यह लोग बैंक के कामकाज पर सवाल उठाने लगे, और एआर देखते रहे। 10 लाख का ऋण लेने वाले अधिकांश सचिवों ने दो से तीन लाख का खाद का कारोबार किया और बाकी आठ लाख अपने व्यापार में लगा दिया, कई सचिव तो 10 फीसद सूद पर कारोबार किया, चूंकि ऐसे सचिवों का साथ एआर देते थे, और कार्रवाई करने के बजाए कार्रवाई के नाम पर हिस्सा लेते थे, इसी लिए सचिवों का इतना मन बढ़ गया, कि धान और गेहूं में करोड़ों रुपये का गोलमाल करने लगें। आधा दर्जन अधिक लोगों के खिलाफ एफआईआर भी हुआ। धान घोटाले में जिले के भ्रष्ट सचिवों ने पूरे प्रदेश में बदनाम किया। जाहिर सी बात है, कि नवागत एआर रवि शंकर सिंह के रहते भ्रष्ट सचिवों की चलने वाली नहीं, इस लिए यह लोग एआर के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया, ताकि इन्हें हटाया जा सके। भ्रष्ट सचिवों की चिंता अब धान और गेहूं में कैसे घोटाला हो को लेकर है। यह वही एआर है, जिन्होंने सहारनपुर एआर रहते सचिवों की भर्ती में सबसे बड़े फर्जीवाड़ा का खुलासा करते हुए बड़ी कार्रवाई की थी, इसकी चपेट में कई एडीओ और एसीडीओ भी आ चुके है। हालांकि बस्ती में भी फर्जी नियुक्ति हुई हैं, लेकिन कार्रवाई करने के बजाए तत्कालीन एआर ने पूरे मामले कोही दबा दिया। इस एआर के ईमानदारी की चर्चा पूरे विभाग में होती है, हालांकि इन्हें इनकी ईमानदारी की कीमत भी चुकानी पड़ी। सहारनपुर से बस्ती इन्हें एक तरह से ईमानदारी की सजा देने के लिए भेजा गया। एक मुलाकात में एआर ने कहा कि वह हीरो बनने नहीं आए हैं, बल्कि अपना काम करने आएं है। कहा कि उनके रहते समितियों पर खाद हमेशा उपलब्ध रहेगी, और किसानों को 266.50 पैसे में ही मिलेगा, भले ही सचिव यह कहते रहें कि छुटटा की समस्या खड़ी हो जाएगी, इस पर उन्होंने सचिवों से कहा कि आप लोगों को सरकार द्वारा जो बार कोड दिया गया उसका प्रयोग करिए, छुटटे की समस्या नहीं आएगी। किसानों का एआर को यह सलाह है, कि आप उन सचिवों को सही कर दीजिए, जो संघ के पदाधिकारी के नाम पर भ्रष्टाचार कर रहे है। किसानों का दावा है, कि यही लोग सबसे अधिक खाद बेचते है। यह भी कहा कि एक पदाधिकारी की पत्नी तो समिति की नियम विरुद्व डायरेक्टर भी है। जब एआर ने सख्ती करनी शुरु की तो एआर पर दबाव बनाने के लिए सचिवों ने सामूहिक इस्तीफा देने का प्रयास किया, तो एआर ने कहा कि जाइए अपने प्रबंधन समिति को इस्तीफा दीजिए। चूंकि जिले में एक भी केैडर का सचिव नहीं हैं, बाबूओं सचिव/विक्रेता बना दिया गया। यही भ्रष्टाचार का कारण बना। अब जरा इस बात का अंदाजा लगाइए कि पूर्व के एआर सचिवों से कहते थे, कि जितना चाहो उतना लूटो, वर्तमान एआर ने कहा एक रुपया भी लूटने नहीं दूगा, अब आप खुद फैसला कीजिए, कि कौन एआर भ्रष्टाचारी है, और कौन नहीं? किसानों का कहना है, कि अगर एआर साहब ने कार्यालय की गंदगी को साफ कर दिया, तो उनका भ्रष्टाचार मिटाने का मकसद पूरा हो सकता है।
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