बस्ती। जय कांस्टक्षन के जनेष्वर चौधरी का अनियमित रुप से अनुबंध करना, डीएम, एडी हेल्थ और सीएमओ को भारी पड़ने वाला है। हाईकोर्ट में इन लोगों के खिलाफ शिकायतकर्त्ता दीपक कुमार मिश्र की ओर से याचिका दायर की जा चुकी है, याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया, और संबधित पक्षों को नोटिस भी जारी कर दिया। मीडिया बार-बार उन लोगों को चेता रही थी, जो लोग अनियमित रुप से अनुबंध कराने में लगे हुए था, इस बात की भी चेतावनी दी गई थी, कि अगर मामला हाईकोर्ट चला गया तो अधिकारियों के लिए जबाव देना कठिन हो जाएगा। डीएम यह नहीं बता पाएगी कि जब आपके निर्देश पर जांच चल लंबित हैं, तो फिर आपने कैसे अनुबंध करने का अनुमोदन दे दिया। सीएमओ इस बात का जबाव नहीं दे पाएगें, कि जब टेंडर लगभग डेढ़ माह पहले फाइनल हो चुका था, तो उसे क्यों इतने दिनों तक रोका गया? कैसे और क्यों वित्तीय साल के अंतिम दिन यानि एक ही दिन में सत्यापन कर लिया और उसी दिन यानि 30 मार्च को अनुबंध भी गठित कर दिया। जबकि जांच लंबित है। सबसे खराब स्थित जांच अधिकारी एडी हेल्थ की होगी। इनकी जांच रिपोर्ट देख कोई भी न्यायाधीश यह कहने पर मजबूर हो जाएगें, कि जांच रिपोर्ट पूरी तरह सीएमओ को बचाने और जय कांस्टक्षन को लाभ पहुंचाने के लिए बनाया गया। जिस तरह एडी हेल्थ ने प्राथमिक कमियों को नजरअंदाज करके रिपोर्ट दिया, उसके लिए इन्हें भारी पड़ सकता है। जिस एडी हेल्थ को यह तक न मालूम हो कि आईसीआईसीआई बैंक राष्टीयकृत नहीं बल्कि प्राइवेट है। उस जांच अधिकारी से तो इसी तरह के जांच रिपोर्ट की उम्मीद की जा सकती है? जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका हैं, और आज फिर लिखा जा रहा हैं, कि पहली बात, अनुबंध तो निरस्त होगा ही, और अगर कहीं कोर्ट ने उस अपील को संज्ञान में ले लिया, जिसमें कोर्ट की निगरानी में हाई कमेटी से जांच कराने की मांग की गई, और कोर्ट ने जांच के आदेश कर दिए, जिसकी संभावना अधिक हैं, तो कईयों की चडडी और बनियाइन दोनों उतर जाएगी। इस मामले में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, एनएचआरएम के एमडी, डीजी हेल्थ, अधीक्षण अभियंता हेल्थ, डीएम, एडी हेल्थ, सीएमओ और जय कांस्टक्षन को पार्टी बनाया गया है। नियमानुसार अगर कोई निविदा विवादित होती है, तो उसका निस्तारण करने के लिए अधीक्षण अभियंता हेल्थ के पास भेज दिया जाता है, लेकिन सीएमओ साहब ने बजाए अधीक्षण अभियंता हेल्थ के पास भेजने के मनमाने तरीके से अनुबंध कर दिया। डीएम के उस आदेश पर सवाल उठ रहा है, और जिसे कोर्ट में भी दाखिल किया गया, कि जब डीएम को मंडलीय स्तर के अधिकारी से जांच कराने का अधिकार ही नहीं तो कैसे इन्होंने मंडलीय स्तर के अधिकारी एडी हेल्थ को जांच अधिकारी बना दिया, और जब जांच अधिकारी बना ही दिया तो फिर क्यों नहीं जांच रिपोर्ट का इंतजार किया? और क्यों बिना जांच पूरा किए, अनुबंध गठित करने का अनुमोदन कर दिया? सवाल तो एडी हेल्थ के उस जांच रिपोर्ट पर भी उठ रहे हैं, जिन्होंने तीन माह तक जांच नहीं किया, और अचानक एक ही दिन में जांच रिपोर्ट दे दिया। एडी हेल्थ के जांच रिपोर्ट पर डीएम ने क्या कार्रवाई किया, इसकी जानकारी शिकायतकर्त्ता को अभी तक पता नहीं दी गई। देखा जाए तो इस मामले में किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभाया, ऐसा लगता है, कि मानो सभी ‘बाबूजी’ के प्रभाव में रहें हों। अगर इस मामले में हाईकोर्ट की ओर से कार्रवाई हो गई, तो पूरे प्रदेश में यह एक नजीर बनेगा, और उन अधिकारियों के लिए भी एक सबक होगा, जो नेताओं के बहकावे में आकर या फिर आर्थिक लाभ के लालच में अनियमित कार्य करते हैं। उन ठेकेदारों के लिए भी एक सीख होगा, जो राजनेैतिक लाभ उठाकर दूसरे अधिकारियों को फंसा देते है। इस मामले में शिकायतकर्त्ता की लड़ाई को भी याद किया जाएगा, जिसने विभाग में ठेकेदारी करने के बाद भी विभाग के अधिकारियों से पंगा ले लिया।
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