राजेश शुक्ल /बस्ती

जाति व्यवस्था के उद्भव को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। पंडितों पर जाति बनाने के आरोपों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। तर्क है कि जाति व्यवस्था का निर्माण किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा नहीं किया गया, बल्कि यह एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम है।  आज तक कोई यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाया है कि जाति व्यवस्था कब और किस पंडित द्वारा बनाई गई। पंडितों को इस आरोप के लिए गलत तरीके से दोषी ठहराया जा रहा है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास 'दुबे' थे, जो दर्शाता है कि उनके समय से पहले ही जाति व्यवस्था मौजूद थी। इसी तरह, संत सिरोमणि रविदास, जो गोस्वामी तुलसीदास से पहले हुए थे, 'चमार' जाति से संबंधित थे, जिससे यह सिद्ध होता है कि जाति विभाजन पहले से ही स्थापित था। मनुस्मृति भी 'वर्ण व्यवस्था' पर प्रकाश डालती है, न कि 'जाति' के निर्माण पर। मनु, जिन्होंने मनुस्मृति लिखी, स्वयं क्षत्रिय थे, जो यह इंगित करता है कि उनके काल में भी जाति व्यवस्था प्रचलित थी। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान ने जाति व्यवस्था की उत्पत्ति पर नई बहस छेड़ दी है। भागवत ने कथित तौर पर कहा है कि 'पंडितों ने जाति बनाई है' और 'जातिवाद बनाकर गलत किया'।

हालांकि, कई ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ इस दावे को चुनौती देते हैं। यह सवाल उठता रहा है कि जाति व्यवस्था वास्तव में किस कालखंड में और किसके द्वारा बनाई गई।

वर्तमान समाज में, विभिन्न समुदायों के लोग, जैसे मुसलमान, सब्जी बेचने, लोहार का काम, मांस बेचने, बढ़ई का काम या नाई का काम बड़े चाव से करते हैं। बांग्लादेशी मुसलमान सफाई का काम भी करते हैं, और उन्हें इन कार्यों से कोई सामाजिक कष्ट या अछूत होने का अनुभव नहीं होता। उनके लिए यह काम की आवश्यकता है।

हिंदुओं में वर्ण व्यवस्था अब काफी हद तक कागजों तक सीमित है। सड़क पर गोलगप्पे, आलू टिक्की या चाऊमीन कौन बना रहा है या बेच रहा है, इससे ग्राहकों को कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी लोग बिना जाति पूछे इन व्यंजनों का आनंद लेते हैं, जिसमें पंडित भी शामिल हैं।

 जाति व्यवस्था की वास्तविक उत्पत्ति कब और कैसे हुई। सरकारी दस्तावेजों में यह व्यवस्था अभी भी मौजूद है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक जड़ें और सामाजिक प्रभाव लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। सतयुग में क्षत्रिय राजा हरिश्चंद्र का काशी में 'डोम' को बिक जाना भी दर्शाता है कि इन प्राचीन कालों में भी जातिगत भेद मौजूद थे। हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था अब केवल कागजों तक सीमित रह गई है। सड़कों पर गोलगप्पे, आलू टिक्की या चाऊमीन कौन बना रहा है या बेच रहा है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सभी लोग बिना जाति पूछे इनका आनंद लेते हैं। पंडित भी इन व्यंजनों का स्वाद लेते हैं, जबकि उन पर जाति बनाने का आरोप लगाया जाता है।  अंत में यह सवाल उठाता हूँ कि यदि पंडितों ने जाति बनाई है, तो इसका सटीक समय काल कौन बता सकता है?  चुनौती देते हैं कि यदि किसी को जाति के निर्माण का सही समय और कालखंड पता हो तो वह इसे सार्वजनिक करे।