बस्ती। कौन नहीं चीफ फार्मासिस्ट एवं सीएमएसडी स्टोर के प्रभारी अजय मिश्र को नहीं जानता। यह वही मिश्राजी हैं, जिनकी सीएमओ कार्यालय में तूती बोलती, किसे ठेका मिलना और किस बाबू को कौन सा पटल चाहिए, यह सीएमओ नहीं बल्कि मिश्राजी तय करते। इनकी गिनती प्रदेश के सबसे पावरफुल चीफ फार्मासिस्ट में होती है। इन्होंने जितना पैसा और नाम कमाया, उतना कम लोग ही कमाए होंगे। इन्हें सीएमओ कार्यालय का चाणक्य भी कहा जाता है, विरोधियों को पटकनी देना कोई इनसे सीखे, इनका कोई दांव खाली नहीं जाता, न जाने कैसे तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे के मामले में इनका दांव खाली चल गया, वरना आज तक इनका दांव खाली नहीं गया, बस्ती से लेकर लखनऊ तक इनका जाल बिछा हुआ है। खतरों से खेलना इन्हें अच्छी तरह आता हैं, इन्हें हारी हुई बाजी को भी जीतना आता है, इसी लिए लोग इन्हें बाजीगर भी कहते हैं, और बाजीगर उसी को कहते हैं, जो हारी हुई बाजी जीतता है। कहा भी जाता हैं, कि किसी व्यक्ति के भीतर अगर इतनी सारी खूबियां हो, वह कैसे नोटिस भेजकर गलती कर सकता है? यह बात समझ में नहीं आती। सवाल उठ रहा है, कि क्यों और किस रणनीति के तहत मिश्राजी ने सीएमओ और तीन डिप्टी सीएमओ को कानूनी नोटिस भेजा, और वह भी ढ़ाई साल बाद, अगर मिश्राजी को यह गलती करनी ही थी, तो उस समय करते जब तत्कालीन सीएमओ बस्ती में थे, कानून के जानकार कहते हैं, कि अगर किसी कर्मचारी को अपने साहब से कोई षिकायत हैं, तो सबसे पहले उसे अपने साहब से बात करनी चाहिए, जरुरी पड़े तो लिखित में आपत्ति जताना चाहिए, अगर छोटे साहब नहीं सुनते तो बड़े साहब से अपनी बात कहनी चाहिए, लेकिन किसी भी कर्मी को यह अधिकार नहीं हैं, कि वह अपने साहब को लीगल नोटिस भेजे, और नोटिस को मीडिया में पब्लिस कराए, इसे कर्मचारी आचार संहिता का उल्लघंन भी माना जाता है। सवाल उठ रहा है, कि क्या मिश्राजी और उनके सलाहकार एक अन्य मिश्राजी को नियम कानून मालूम नहीं था, कहा भी जाता है, अगर ऐसे मामले में मिश्राजी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले दिनों में चपरासी भी सीएमओ को लीगल नोटिस भेजेगा।
सवाल तो तत्कालीन सीएमओ के क्रियाकलापों पर भी उठ रहा है, पूछा जा रहा है, कि क्यों नहीं उस समय इन्होंने मिश्राजी के खिलाफ कार्रवाई किया? और क्यों नहीं निलंबन की संस्तुति की? चाहते तो यह मिश्राजी को उनके कार्य से मुक्त कर सकते थे, वेतन बाधित कर सकते हैं, कहीं और अटैच कर सकते थे, लेकिन इन्होंने ऐसा न करके अनुशासनात्मक कार्रवाई को लिखा, अगर सीएमओ चाहते तो फर्जी सिग्नेचर के मामले में मिश्राजी और वार्ड ब्याय के खिलाफ विधिक कार्रवाई कर सकते थे, क्यों कि यह मामला फ्राड का है? अगर उसी समय तत्कालीन सीएमओ समझदारी से काम लेते हुए उक्त कार्रवाई कर देते तो आज इन्हें मिश्राजी लीगल नोटिस नहीं थमाते। लीगल नोटिस थमाकर एक तरह से मिश्राजी ने विभाग और उच्चाधिकारियों से पंगा ले लिया हैं, क्यों कि जो बाते छन कर आ रही है, उसमें जिन लोगों को नोटिस भेजा गया, वे सभी लामबंद हो रहे है। नोटिस तो तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे, डिप्टी सीएमओ डा. एसबी सिंह, डा. एके चौधरी और डा. एके गुप्त को मिल गई है। सभी ने इसे गेैरकानूनी और कर्मचारी आचार संहिंता का उल्लघंन बताया। जानकार यह भी बताते हैं, कि अगर 90 दिन के भीतर नोटिस नहीं भेजी जाती और उसके बाद भेजी जाती है, तो उसकी विधिक मान्यता समााप्त हो जाती। मामला मीडिया में आने के बाद मानो जैसे पूरे विभाग में कोई तूफान आ गया हो, बस्ती से लेकर लखनऊ तक नोटिस की चर्चा हो रही है। इसकी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, और सवाल किए जा रहे हैं, कि क्या कोई कर्मचारी अपने साहब को लीगल नोटिस भेज सकता है? अब तो उन मिश्राजी की भी खोज कर ली गई, जिन्होंने नोटिस को अमली जामा पहनाया। बड़े मिश्राजी के साथ छोटे मिश्राजी भी चपेट में आ सकते है। मिश्राजी का जो होगा, वह तो होगा ही, लेकिन इसके लिए मिश्राजी हमेशा याद किए जाएगें। कहा जाता है, जिस तरह निरीक्षण करने के पीछे सीएमओ का एक मकसद रहा होगा, ठीक नोटिस जारी करने के पीछे भी मिश्राजी का मकसद छिपा हो सकता है। सवाल तो उस वार्ड ब्याय की सीएमएसडी में तैनाती और अभिलेखों में इंटी करने को लेकर उठ रहा है। जिस वार्ड ब्याय को वार्ड की साफ सफाई करनी चाहिए, मेडिकल वार्ड में होना चाहिए, वह सीएमएसडी में क्या कर रहा है? किसने उसे सीएमएसडी में अटैच किया, और जब तत्कालीन सीएमओ ने फर्जी सिग्नेचर के मामले में उसका तबादला गौर कर दिया था, तो फिर क्यों वर्तमान सीएमओ ने फिर से उसे सीएमएसडी में तैनात कर दिया? इससे साफ पता चलता हैं, कि स्टोर इंचार्ज और वार्ड ब्याय मिलकर खेल-खेल रहे है। वर्तमान सीएमओ भी चाहें तो मिश्राजी को कार्यमुक्त कर उन्हें किसी अन्य स्थान पर अटैच कर सकते है, इनके निलंबन की संस्तुति भी कर सकते हैं, और वेतन बाधित भी कर सकते हैं? यह सब वही सीएमओ कर सकते हैं, जो ईमानदार होते है। एक भ्रष्ट सीएमओ से इस तरह की कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी तैसा होगा। अगर मिश्राजी को ढ़ाई साल बाद अपने मानहानि की याद आती है, तो सवाल तो उठेगा ही। जिन लोगों को नोटिस जारी किया गया, उन लोगों ने बताया कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट एडी हेल्थ को दे दी, जिसमें चीफ फार्मासिस्ट का सिग्नेचर वार्ड ब्याय के द्वारा करना पाया गया, रिपोर्ट षासन को चली गई, मगर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई, क्यों नहीं हुई, इसे मिश्राजी से बेहतर कोई नहीं बता सकता।
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