बस्ती। आज हम आप लोगों में यह बताने जा रहे हैं, कि कैसे नेताजी के आय में हर चुनाव के बाद बढ़ोत्तरी होती है। बहुत कम से ऐसे वर्तमान और पूर्व माननीय होगें जिनकी संपत्ति न बढ़ी हो, अगर किसी नेताजी की संपत्ति हारने के बाद भी बढ़ती है, तो उसका सबसे बड़ा लेटर पैड का बेचना माना जा रहा है। यह लोग माननीय रहते तो निधि बेचते हैं, और न रहने पर लेटर पैड बेचते है। कोई भी ऐसा वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधि नहीं होगा, जो अपना लेटर पैड न बेचता हो। निधि बेचने से अधिक लेटर पैड बेचने में कमाई होती है। क्यों कि निधि को तो साल में एक बार ही बेची जाती है, लेकिन लेटर पैड तो साल भर बेची और खरीदी जाती है। नगर पंचायत भानपुर में सबसे अधिक लेटर पैड बेचने के मामले सामने आ रहे हैं, डूडा का जितना भी काम हो रहा है, वह काम किसी न किसी नेताजी के लेटर पैड पर लाया हुआ काम है। नेताजी के लेटर पैड पर जो भी ठेकेदार काम लाया जाता हैं, उसका 70 फीसद पैसा कमीशन और जीएसटी में चला जाता है, 30 फीसद में अगर सड़क बनेगा तो वह हल्की बारिश में बह जाएगा, और एक दो माह में टूट भी जाएगा। नेताजी के पैड पर भले ही कोई कार्रवाई न होती हो, लेकिन इनके पैड पर करोड़ों का काम अवष्य स्वीकृति हो जाता है। चाहें नगर पंचायत हो या फिर डूडा हो सारे खेल लेटर पैड के पिच पर ही होते है। लेटर पैड पर पीड़ितों और जरुरतमंदों का काम भले ही न होता हो, लेकिन लेटर पैड पर अवष्य हो जाता हैं, क्यों कि लेटर पैड की पैरवी करने के लिए खुद नेताजी लखनउ जाते हैं, और मंत्रियों से पैरवी कराते है। अगर यही पैरवी नेताजी पीड़ितों और जरुरतमंदों की करते तो नेताजी का जयजयकार होता और नेताजी कभी चुनाव नहीं हारते, लेकिन नेताजी को अपनी जनता से अधिक कमीश\न जो प्यारा होता। कमीषन के लिए नेताजी कुछ भी करने को तैयार हो जाते है। कहना गलत नहीं होगा, कि लेटर पैड भ्रष्ट ठेकेदारों और नेताओं के लिए संजीवनी साबित हो रहा है। निधि बेचने में जितनी बदनामी होती है, उतना लेटर पैड बेचने में नहीं होती। क्यों कि लेटर पैड बेचने की जानकारी नेताओं और ठेकेदारों को ही होती है, अन्य को जानकारी तब होती है, जब नेताजी और उनके ठेकेदार करोड़ों का काम पाने में सफल हो जाते है। इस लेटर पैड बेचने के खेल में सबसे अधिक लाभ में ठेकेदार रहता हैं, नेताजी तो 20 फीसद सर्विस चार्ज लेकर किनारे हो जाते हैं, लेकिन ठेकेदारों के कमाने का कोई पैमाना  नहीं है। इसी लिए नगर पंचायत भानपुर में एक ऐसे ठेकेदार हैं, जिनकी आर्थिक स्थित अपने नेताजी से अधिक है। भले ही इनकी कमाई के चलते नेताजी और उनकी पत्नी को हार का मुंह देखना पड़ा हो।

क्या आप लोगों ने कभी यह सुना है, कि भंला नेताजी ने यह कहा हो कि जो काम उनके लेटर पैड पर लाया गया, उसकी जानकारी उन्हें नहीं हैं, नेताजी ने यह भी कभी नहीं लिखा कि पेड का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो, एक भी नेताजी ने अभी तक एक भी ठेकेदार के खिलाफ पैड का दुरुपयोग करने के मामले में एफआईआर नहीं दर्ज करवाया, इसका मतलब सीधा सा है, कि पैड का उपयोग/दुरुपयोग नेताजी की सहमति ने ठेकेदारों ने किया। ऐसे नेताओं की कभी भी नहीं, जिन्होंने किए गए षिकायत को यह कर अस्वीकार कर दिया कि किसी ने उनके पैड का दुरुपयोग किया। नेताओं के पैड पर करोड़ों का काम आ रहा है, और गुणवत्ताविहीन काम हो भी रहा हैं, लेकिन नेताजी न तो घटिया गुणवत्ता की शिकायतें करते और पैड के दुरुपयोग का रोना रोते। उन्हीं मामलों में रोते हैं, जिनमें इन्हें हिस्सा नहीं मिलता। कभी-कभी तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती कि जब दो प्रतिनिधि इस लिए भिड़ जाते हैं, क्यों कि पैड पर काम कोई और लाया, और जब काम आ गया तो नेताजी ने अधिक कमीशन के लालच में यह कह दिया, कि यह काम तो फंला ठेकेदार लाएं है। एक दो नगर पंचायत ऐसी भी हैं, जहां पर नेताजी लेटर पैड को रेवड़ी की तरह बांटते/बेचते। जब काम आ जाता है, तो दूसरे-तीसरे ठेंकेदार को काम दे दिया जाता, नेताओं को खुद पता नहीं रहता है, उन्होंने अपना लेटर पैड किस-किस ठेकेदार को बेचा। इसी तरह जब नगर पंचायत भानपुर और रुधौली में वंदन योजना के तहत दो-दो करोड़ के काम के लिए दो-तीन ठेकेदारों को लेटर पैड बेचा गया, मेहनत और पैसा किसी और ने खर्च किया, लेकिन एक पूर्व माननीय का चहेता ठेकेदार षार्टकट और अधिकारियों की मिलीभगत से जो प्रस्ताव दो साल डंप था, उस पर कब्जा कर लिया। मेहनत और पैसा खर्चा करने वाला ठेकेदार देखता रह गया। कहने का मतलब नेताजी लेटर पैड ही नहीं बेचते बेईमानी भी करते है। लेटर पैड खरीदने और बेचने का काम संगठित गिरोह की तरह हो रहा हैं, अगर कोई काम किसी क्षेत्र के किसी ठेकेदार ने लाया तो भले ही चाहें काम लाने में नेताजी का कोई योगदान न रहा हो, लेकिन भूमि पूजन तभी होगा, जब नेताजी के द्वारा निर्धारित हिस्सा नहीं दे दिया जाता। अन्यथा नेताजी इतनी षिकायत करेगें कि ठेकेदार के लिए लेने के देने पड़ जाता है। जनता यह समझती है, कि उसका नेता कितना ईमानदार कि जांच करवा रहा हैं, जबकि असलियत यह है, कि जांच कराने के नाम पर नेताजी अलग खेल खेल रहें है।