बस्ती। कहा जाता है, कि अगर आप के पास पैसा है, तो आप डीआईओएस कार्यालय में कुछ भी करा सकते है। फर्जी आदेश तक पारित करवा सकते है। फर्जी रिट याचिका पर बहाली तक पा सकते है। यह पहला ऐसा विभाग होगा, जिसके अधिकारी से लेकर बाबू तक और विधालयों के प्रबंधक से लेकर प्रधानाचार्य तक सभी गोलमाल करते है। कहने को तो प्रबंधक और प्रधानाचार्य बहुत ही सम्मानित होते हैं, लेकिन कहने और सुनने में बहुत फर्क है। चूंकि बर्खास्त करने का अधिकार प्रबंधक में निहीत रहता है, इस लिए यह प्रधानाचार्य के साथ मिलकर मनमानी करते हैं, जिसे चाहते हें, बर्खास्त करते हैं, और जिसे चाहते हैं, नौकरी पर रखते है। डीएम और डीआईओएस के लिखने का भी प्रबंधक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसे डीआईओएस की कमजोरी ही मानी जाएगी, वरना डीएम के आदेश का पालन न मानने के आरोप में डीआईओएस चाहें तो विधालय की कमेटी को भंग कर सकतें है, और एकल खाता संचालित कर सकतें है। लेकिन जब डीआईओएस ही फर्जीवाड़े का हिस्सा रहेगें तो फिर डीएम चाहें जितना करते रहें, क्या फर्क पड़ता? अगर यह मामला डीएम के संज्ञान में आ गया तो प्रबंधक और डीआईओएस जबाव नहीं दे पाएगें।

जिस राम सनेही यादव नामक सहायक अध्यापक को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर डीएम ने बर्खास्त करने को लिखा, उसी अध्यापक को राष्टीय कृषक इंटर कालेज रघुराज नगर सूदीपुर के प्रबंधक हरीशचंद्र सिंह और प्रधानाचार्य महेश सिंह ने डीएम और डीआईओएस के आदेश-निर्देश को अनुचित लाभ के लिए रददी की टोकरी में डाल दिया, और अध्यापक से चपरासी बना दिया। लेकिन बर्खास्त नहीं किया, जाहिर सी बात हैं, इतनी बड़ी मेहरबानी वैसे तो नहीं की होगी, अवष्य बड़ा डील हुआ होगा, डील ही नहीं हुआ होगा अनुचित लाभ भी लिया गया होगा। वरना इस तरह किसी को कोई नहीं बचाता। बहरहाल, प्रबंधक और प्रधानाचार्य ने यह साबित कर दिया कि दोनों कितना बड़ा ईमानदार है। दोनों ने अपने-अपने पद को कलकिंत किया। इतना ही नहीं डीआईओएस ओर बाबू अनिल सिंह एवं सूदीपुर के प्रबंधक और प्रधानाचार्य की मिली भगत से जिस अध्यापक को बर्खास्त होना चाहिए, उसे सालों से वेतन दे रहे है। आखिर क्यों और किस आधार पर एक ऐसे व्यक्ति को डीआईओएस वेतन का भुगतान कर रहें हैं, जिसकी नियुक्ति ही फर्जी हैं, और जिसे हाईकोर्ट ने भी कोई राहत नहीं दिया, डीआईओएस और बाबू ने एक ऐसे फर्जी रिट याचिका का सहारा लिया, जो किसी परमहंस यादव के नाम हैं, और जिसे हाईकोर्ट बहुत पहले निस्तारित भी कर चुका है। सब लोगों ने मिलकर हाईकोर्ट को धोखा दिया, और ऐसे रिट याचिका को आधार मानकर बहाली और वेतन का भुगतान कर दिया, जिसके नाम से कोई रिट याचिका ही नहीं। इस तरह का फर्जीवाड़ा इससे पहले न तो कभी देखा गया और न कभी सुना गया। इस फर्जीवाड़े में पूरा का पूरा कूनबा शामिल है। वैसे इस फर्जीवाड़े में सबसे खराब भूमिका अब तक के डीआईओएस और भुगतान लिपिक की रही, लेकिन इन लोगों से अधिक खराब भूमिका राष्टीय कृषक इंटर कालेज रघुराज नगर सूदीपुर के प्रबंधक हरीशचंद्र सिंह और प्रधानाचार्य महेष सिंह की रही। यही कारण है, कि अब अधिकांश प्रबंधक ईमानदार नहीं रह गए, जिस ईमानदारी के चलते इनकी पहचान थी, उसी ईमानदारी ने बेईमानी का रुप ले लिया। इसे लेकर राष्टीय कृषक इंटर कालेज रघुराज नगर सूदीपुर के अनुचर रमेष कुमार ने मुख्यमंत्री से शिकायत करते हुए प्रकरण की जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। पत्र में उसी रिट याचिका संख्या 471/2013 का जिक्र किया गया, जिसके आधार पर डीआईओएस ने राम सनेही यादव का स्थानान्तरण/समायोजन ष्याम बहादुर आर्य कन्या इंटर कालेज बस्ती से राष्टीय कृषक इंटर कालेज रघुराज नगर सूदीपुर के लिए 18 मार्च 2015 को अनुबंध के साथ किया गया। जबकि उक्त याचिका 22 अगस्त 2017 को हाईकोर्ट द्वारा डिसमिस कर दिया गया, कहा गया कि राम सनेही सादव की अपील डिसमिस होने के उपरांत भी वर्तमान समय तक डीआईओएस के द्वारा अनियमित रुप से वेतन का भुगतान किया जा रहा है। यह शिकायत 12 अप्रैल 2026 को की गई।