बस्ती। सुनकर हैरानी होगी कि जिले में खाद का संचालन सीडीओ, एआर और डीओ नहीं बल्कि खाद के तीन माफिया कर रहे है। दिनेश गुप्त, पवन अग्रवाल और अमन गुप्त नामक माफिया यह तय करते हैं, कि आज खाद कितने रुपये में बिकेगी। यूरिया का दाम अगर 266 रुपया है, तो उसे कितने में रिटेलर्स को दिया जाए ताकि अधिक से अधिक कमाई की जा सकें। रिटेलर्स को 400 में दिया जाए या फिर साढ़े चार सौ में। एक बोरी पर 145 रुपया कमाया जाए या फिर दो सौ। रेट जितना अधिक होगा, उतना अधिक साहबों को कमीशन मिलेगा, और खाद माफियों को लाभ होगा। इसी लिए यह खाद के माफिया कहे जाने वाले जो रेट चाहते हैं, उसी रेट में रिटेलर्स को बेचते है। जाहिर सी बात है, जब रिटेलर्स को चार सौ या फिर साढ़े चार सौ में यूरिया मिलेगा तो वह कैसे 266 में बेचेगा? इसी बात का विरोध किसान, किसान संगठनों के पदाधिकारी, मीडिया और कुछ जागरुक नेता बैठकों, पत्रों के जरिए और आवाज उठाते रहते है। इन लोगों की आवाज इस लिए दबा दी जाती है, क्यों कि कार्रवाई और जांच करने वाले साहब ‘सोफा’ और कमीशन पर पर बिक जाते है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस खाद की सरकारी कमान सीडीओ, एआर और डीओ यानि जिला कृषि अधिकारी के हाथों में हो, और उसके बाद भी किसानों को अगर खाद न मिले या फिर उन्हें 500 ब्लैक में लेना पड़े तो फिर ऐसे अधिकारियों की फौज होने से किसानों को क्या फायदा। सवाल उठ रहा है, कि क्या जिले के खाद की कमान अधिकारियों के हाथों में या फिर खाद माफिया के हाथों में? कमीशन ने अधिकारियों की आखों पर पटटी बांध दिया हैं, कार्रवाई करने के बजाए भरी बैठक में सीडीओ साहब भ्रष्ट अधिकारियों का बचाव करते नजर आते है। जिन खाद के थोक विक्रेताओं को लाइसेंस दे रखा है, वह खाद के व्यापारी कम और खाद के माफिया अधिक लगते है, इन्हें खाद माफिया किसी और ने नहीं बल्कि सीडीओ और डीओ ने बनाया। लगता ही नहीं यह लोग किसान हित में काम कर रहें, ऐसा लगता हैं, मानो यह लोग माफिया हित में काम कर रहे है। कागजों और कहने में तो नौ खाद के थोक विक्रेता हैं, लेकिन इनमें रामचंद्र गुप्त फर्म के दिनेश गुप्त, बालाजी एजेंसी के पवन अग्रवाल और सत्यनरायन एंड संस के अमन गुप्त के हाथों में जिले के 70 फीसद से अधिक खाद का कारोबार रहता है, चूंकि इन लोगों की क्षमता रैक मंगाने की होती है, इस लिए यह तीनों सरकारी तंत्र को नचाते है। यह तीनों मिलकर लगभग सात लाख यूरिया का कारोबार एक सीजन में करते है। अगर इन तीनों ने एक बोरी में 145 रुपया भी कमाया तो, और उसमें से 45 रुपया साहबों में कमीषन के रुप में बांट दिया तो तब भी इन तीनों की जेबों में लगभग नौ करोड़ गया। देखा जाए तो साहबों और मंत्री की जेबों में लगभग पांच करोड़ गया। इन तीनों फर्मो के अतिरिक्त बालाजी खाद भंडार, सिंह उर्वरक हर्रैया, गुप्ता खाद भंडार बभनान, लक्ष्मीनरायन पांडेय बभनान, आयूष एजेंसी पांडेय बाजार एवं षाक्बंरी टेडिगं कंपनी है। यह सभी होलसेलर्स, कंपनी की कृपा पात्र से कारोबार कर रही हैं। एक रैक में अगर इन लोगों को दो चार टक खाद मिल गया तो यह अपने आप को किस्मत वाला समझते है। कमीशन का पैसा तीन होलसेलर्स साहबों के घरो में पहुंचाते है।

‘डीओ’ को ‘रिटेलर्स’ से दोनों ‘सीजन’ में ‘चार’ करोड़ ‘मिलता’

जिले में लगभग एक हजार खाद के रिटेलर्स संचालित है। प्रत्येक विक्रेता से दो से पांच हजार एक सीजन में लिया जाता है। औसतन दो हजार मिलता है। इस तरह रवि और खरीफ सीजन में डीओ की जेब में लगभग चार करोड़ गया, इनमें मंत्री के जेब में कितना गया, चपरासी और बाबू को कितना मिला और विकास भवन को कितना गया, इसका खुलासा नहीं हो सकता। होलसेलर्स से जो साढ़े चार करोड़ मिला, वह अलग है। बताते हैं, इतना बड़ा कमीशन का खेल इससे पहले नहीं था, यह खेल वर्तमान जिला कृषि अधिकारी के आने के बाद हुआ। इनके आने के बाद सभी कर अवैध कमाई बढ़ गई, बाबूओं का हैसियत बढ़ गया, मंत्री और साहब इनसे खुश रहने लगें, अगर खुष न होते तो इतनी शिकायत के बाद मंत्री ने इनका अपमान नहीं बल्कि सम्मान किया, मंत्रीजी की नजर में बाबू ही सबसे बड़ा चोर है। अधिकारी की तो मंत्रीजी तारीफ करते है। तबादला होने वाले बाबूओं का कहना है, कि अगर हम लोग मंत्रीजी की नजर में चोर और बेईमान थे, तो साहब कैसे ईमानदार हो गएं?