बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि आखिर कृषि मंत्री सूर्यप्रताप षाही और निदेशक पंकज त्रिपाठी ने जेडीए के एसटी रहे दीप नरायन वर्मा के तबादले को संशोधित करने के लिए कितने में सौदा किया, क्यों कि बिना सौदा के कोई भी तबादले को संशोधित नहीं कर सकता? सौदा होने की बात इस लिए कही जा रही है, कि क्यों कि पीएम के प्राथमिकता वाले जिला श्रावस्ती सहित बलरामपुर, बहराइच, सिद्वार्थनगर, भदोही, चित्रकूट, चंदौली, सोनभद्र एवं फतेहपुर जनपदों में अगर किसी कर्मचारी का तबादला हो जाता है, तो न तो उसका तबादला रुक सकता और न संशोधन ही हो सकता, तबादला तीन साल नौकरी करने के बाद ही होगा। इन जिलों के लिए तबादला रोकने और संशोधन होने का नियम ही नहीं हैं, तबादला एक ही सूरत में संशोधन हो सकता है, जब सीएम इसकी अनुमति देगें। इसी लिए दावा किया जा रहा है, कि अगर दीप नरायन वर्मा के तबादले में संशोधन हुआ तो अवष्य मत्री और कृषि निदेशक की ओर से फर्जीवाड़ा किया गया होगा, बिना सीएम की अनुमति के मोटा लिफाफा लेकर संशोधन कर दिया गया होगा। क्यों कि अभी तक न तो किसी का तबादला रुका और न संशोधन ही हुआ, तो फिर कैसे वर्माजी का संशोधन हो गया? वर्माजी का तबादला बस्ती से श्रावस्ती हो गया, जिस दिन तबादला हुआ, उस दिन विभागीय मंत्री बस्ती में एक कार्यक्रम में बंजरिया फार्म आए हुए थे, तबादला रोकवाने के लिए जेडीए साहब खुद मंत्रीजी के पास गए थे, लेकिन बात नहीं जमी। पीएम की प्राथमिकता वाले नौ जिलों को पिछड़ा माना गया, इसी लिए इन जिलों में जितनी भी योजनाएं चल रही है, उन सभी को संतृप्त करना अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी होती है। इन जिलों में काम बहुत करना पड़ता, इसी लिए कोई अधिकारी और कर्मचारी श्रावस्ती जैसे जिलों में नहीं जल्दी जाना नहीं चाहता।
दीपनरायन वर्मा भी श्रावस्ती नहीं जाना चाहते थे, क्यों कि अगर यह श्रावस्ती चले जाते तो फिर इनके खाद की दुकान को कौन देखता? इनके भाई बालमुकंुद की पत्नी रीना चौधरी के नाम रामा टेडर्स का संचालन कौन करता, और कौन मृदा परीक्षण में हर साल प्रयोग होने वाले लगभग एक करोड़ के केमिकल में फर्जीवाड़ा करता? भाई के नाम भानपुर में संचालित खाद की दुकान पर खाद ब्लैक में कौन बेचता? मृदा परीक्षण प्रयोगषाला में वर्माजी के भाई आउटसोर्सिंग में आपरेटर के पद पर काम करते हैं, उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा कौन डालता? कहने का मतलब अगर यह श्रावस्ती चले जाते तो इनके घर का साम्राज्य समाप्त हो जाता। इनके भाई के नाम भानपुर में जो खाद की दुकान है, उस दुकान पर होलसेलर्स से दबाव बनाकर अधिक खाद और उधार में दिलवा देते थे, पैसा दिया कि नहीं दिया, कोई बात नहीं। वैसे भी इन्हें जेडीए और पूर्व भूमि संरक्षण अधिकारी डा. राजमंगल चौधरी का चहेता माना जा रहा है। यह भी कहा जाता है, कि इन्हीं अधिकारियों के सहयोग से इन्होंने संशोधन करवाकर लखनउ मुख्यालय करवा लिया, ताकि बस्ती में यह अपना और अपने भाई के वैध/अवैध कारोबार का संचालन आसानी से कर सके। चूंकि मुख्यालय में कोई यह जानने का प्रयास नहीं करता कि कौन कर्मचारी आ रहा है, और कौन नहीं आ रहा? अपनी मर्जी से नौकरी करने की पूरी आजादी रहती है। श्रावस्ती से बस्ती आना उतना आसान नहीं जितना लखनउ से बस्ती आना।
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