बस्ती। संजय चौधरी को अगर कोई उदघाटन करने वाला नेता नहीं मिलता, तो इससे इनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन्होंने पटेल चौक पर पटेल गेट का निर्माण करवाया, और खुद उदघाटन भी किया, इसी तरह 10 जुलाई को जिला पंचायत कार्यालय का भी उदघाटन संजय चौधरी ही करेगें। जबकि 10 जुलाई को जिले में मुख्यमंत्री सहित भाजपा के दो दर्जन से बड़े नेता मौजूद रहेगें। लोगों को उम्मीद थी, कि और कोई नेता समय दे या न दे लेकिन इनके राजनीति के गुरु और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी अवष्य समय देगें। उदघाटन करने का हक भी पंकज चौधरी का ही बनता था, एक तरह से संजय चौधरी प्रदेश अध्यक्ष को इसी बहाने सम्मान देते और खुद को लोगों के सामने मजबूत करते। बहुत कम देखने को मिलता है, कि निर्माण भी वही करवाए और उदघाटन भी वही करे। अधूरे निर्माण कार्यालय का उदघाटन करने के पीछे इनका कार्यकाल को समाप्त होना माना जा रहा है, वरना लगातार गेट और कार्यालय का उदघाटन न होता। पटेल चौराहें पर गेट का उदघाटन करते समय पहली बार जिला पंचायत अध्यक्ष ने पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के सहयोग की सराहना किया। गेट को संजय चौधरी ने अब तक के सबसे बड़े काम को करना बताया। गेट के उदघाटन को लेकर लोगों में कोई खास उत्सुकता नहीं देखा गया। अच्छे खासे कार्यालय को तोड़वाकर जो इनके कार्यकाल में नया कार्यालय बना, उसे पूरी तरह धन की बर्बादी और कमीशनबाजी माना जा रहा है। जिस कार्यालय में नौ लाख उसके नवीनीकरण पर खर्च हुआ, जिसके भुगतान के लिए एक भाजपा आज भी परेशान हैं, उस कार्यालय पर अगर करोड़ों रुपया खर्च किया गया तो इसे धन की बर्बादी ही कहा जाएगा। इनका कार्यकाल भले ही दो-तीन दिन अवशेष हैं, लेकिन जाते-जाते यह हर जगह अपना पत्थर लगवाना चाह रहे है। वैसे अभी से ही इनके चेहरे पर कुर्सी जाने का दर्द स्पष्ट झलक रहा है। एक जिला पंचायत सदस्य ने बताया कि अध्यक्ष ने हम लोगों को चुनाव लड़ने और क्षेत्र में जाने के लायक ही नहीं छोड़ा। दावा किया कि वर्तमान में जितने भी सदस्य हैं, अगर वे चुनाव लड़ते हैं, तो उनमें से शायद ही कोई जीतकर दुबारा जिला पंचायत के सदन में जा सके। कहते हैं, कि मलाई काटे संजय चौधरी और गिल्लम चौधरी, जलालत हम लोगों को झेलनी पड़ रही है। जब भी जिला पंचायत की बर्बादी का जिक्र होगा, तो उसमें संजय चौधरी और गिल्लम चौधरी का अवष्य होगा। जिले भर के पक्ष और विपक्ष के नेताओं और जिला पंचायत सदस्यों में इतनी भी हिम्मत नहीं हुई, कि वह अध्यक्ष को गांधीनगर स्थित बन रहे दुकान के स्थान पर पार्किगं बनाने का दबाव बनाते, अब जरा सोचिए दुकान की आवष्यकता थी, कि पार्किंग की। पार्किगं इस लिए नहीं बनने दिया ताकि कमीशन मिल सके। एक-एक दुकान को 15-20 लाख में बेचा गया, कहा गया कि पांच लाख का चेक देना है, और 15 लाख नकद। अब आप लोग समझ गए होगें, कि पार्किगं जरुरी था, कि दुकान। अगर पार्किगं बन जाता तो संजय चौधरी को लोग हमेशा याद रखते और कहते कि भले ही इन्होंने जिला पंचायत को लूट लिया, लेकिन पार्किंग तो बनवाया। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा है, कि जब इनकी 12 जुलाई को बिदाई होगी, तो लोग इनकी किस बात की तारीफ करेगें। सच तो यह है, कि इनके पांच साल के कार्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे यह यादगार बताया जा सके। गेट का निर्माण करवाना कोई बड़ा काम नहीं होता, वैसे ही गेट के निर्माण में माननीय 50 फीसद कमीशन लेते है।
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