बस्ती। कहीं ऐसा न हो कि आरकेवीवाई की तरह 10 लाख ऋण सीमा का भी पैसा फंस जाए। सीडीओ और एआर का सारा ध्यान समितियों पर खाद पहुंचाने पर हैं, लेकिन कोई यह नहीं देख रहा है, और न जानने का प्रयास कर रहा है, कि खाद जा कहां रहा है? बकौल सीडीओ और एआर, अगर समितियों पर खाद जा रही है, तो क्यों खाद के लिए किसान चिल्ला रहा है। समितियों पर खाद नहीं, पैसा नहीं तो फिर अधिकारी इतना मेहनत क्यों कर रहे हैं? सीडीओ साहब आप तो आज नहीं कल जिले से चले जाएगें, लेकिन बैंक को दिवालिया करके जाएगें, इस लिए आप बैंक के सचिव, एआर, एसीडीसीओ और एडीओ को क्षेत्र में भेजिए, और पता करवाइए कि बैंक का करोड़ों रुपया कहां गया? एडीओ साहब लोग तो फील्ड में दिखाई भी पड़ जाते हैं, लेकिन एआर, सचिव और एसीडीसीओ तो दिखाई ही नहीं पड़ते है। जबकि शासनादेश है, कि एआर, एसीडीसीओ और एडीओ फील्ड में जाएं और किसानों से वार्ताकर उनकी समस्या मौके पर ही निस्तारित करें। मानो एआर और चार एसीडीसीओ ने एसी कमरा न छोड़ने की कसम खा रखी हो। सच पूछिए तो आज तक किसान यह नहीं समझ पाया कि यह चारों एसीडीसीओ का काम क्या और यह रहते कहां? एडीओ का तो नाम भी लोगों को मालूम होगा, लेकिन एसीडीसीओ का नाम और पता दोनों नहीं मालूम। दावा किया जा रहा है, कि अगर चारों तहसीलों के एसीडीसीओ और एडीओ अपना काम ईमानदारी से कर दे तो न तो किसानों को खाद के लिए परेशान होना पड़ेगा, और न बैेंक का पैसा ही फंसेगा। कहना गलत नहीं होगा, कि खाद बिक्री, धान और गेहूं खरीद योजना को पलीता लगाने में एसीडीसीओ ने कोई कसर नहीं छोड़ा। यह लोग एआर के साथ में बैठकर कौन सी ऐसी योजना बनाते हैं, कि किसानों को खाद ही नहीं मिल पाता। अगर इनकी योजना इतनी सफल होती तो धान और गेहूं का एक भी दाना ईधर से उधर नहीं होता। इन्हीं लोगों के चलते जिला धान खरीद घोटाले में रिकार्ड बनाया। ऐसा लगता है, कि सीडीओ साहब को इन लोगों से काम लेना आता ही नहीं। जिले का दुभागर््य कहिए या फिर एआर कार्यालय का, इन्हें ऐसा सीडीओ मिला जिसने खाद की सारी कमान अपने हाथ में ले रखी है। यह सीडीओ के लिए नहीं बल्कि एआर और एसीडीसीओ के लिए शर्म की बात हैं, कि उनके विभाग का कमान सीडीओ संभाले हुएं है। इसे तो विभाग के लोगों की कमजोरी मानी जाएगी। अगर इसके बाद भी किसानों को खाद न मिले और बैंक का पैसा वापस न हो, तो ऐसे सीडीओ के हाथ में कमान होने से क्या फायदा? ऐसा लगता है, कि सीडीओ साहब, एआर की ईमानदारी और उनकी मेहनत का फायदा नहीं उठा पा रहे है। लोगों का मानना है, कि अगर सीडीओ और एआर मिलकर काम करते तो किसानों को खाद भी मिलता और बैंक में पैसा भी जमा होता। बड़े से बड़ा और ईमानदार से ईमानदार अधिकारी तब सफल होता जब उसका साथ अधिकारियों का मिलता है। चूंकि आईएएस अधिकारियों में इतना घंमड होता है, कि वह अधीनस्थों का सहयोग लेना अपनी शान के खिलाफ समझते है।