बस्ती। भाजपा के भीतर 2027 को लेकर खूब आत्म मंथन चल रहा है। परम्परागत वोट बचाने को लेकर पार्टी के भीतर जिस तरह मंथन हो रहा है, उससे बता चलता है, कि पार्टी के लिए 2027 जीतना आसान नहीं होगा, अगर पार्टी परम्परागत वोट बचाने में नाकाम रही तो उसके हाथ से यूपी निकल भी सकता है। परम्परागत वोट बचाना पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पार्टी 2027 को लेकर काफी चिंचित नजर आ रही है। कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का जिन-जिन लोगों ने उपयोग/दुरुपयोग किया, चाहें वह जनप्रतिनिधि रहें हो या फिर चाहें वह पार्टी पदाधिकारी रहें हों, सबने अपने-अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाया, बैंक बैलेस बढ़ाने के चक्कर में पार्टी का बैलेंस ‘वोट’ डगमगा गया।

पार्टी का दुभार्ग्य यह है, कि हारे या जीते प्रतिनिधियों में सबसे बड़ी समस्या आत्म अहंकार से ग्रसित होना है। जो यह सोच रहे हैं, और कर रहें, उसे यह सही मान रहें है। पार्टी लाइन से इन्हें कोई लेना देना नहीं। अब तो एक चलन और चल गया, यह कथित पार्टी खेवनहार, हर दो माह बाद कभी योगी तो कभी अमित शाह तो कभी मोदी का फोटो गैलरी से फोटो निकालकर सोषल मीडिया को बंाट देते हैं। पार्टी का करो या मरो अभियान एसआईआर चल रहा हैं, पार्टी के अभिमन्यू का वध करने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियां बंदूक दाग रही हैं, पर पार्टी के जनप्रतिनिधि औ।र पदाधिकारी उस व्यवस्था के परिचायक हैं, जिसमें ‘जब रोम जल रहा था, तो राजा नीरो बंसी बजा रहा था’। वही हाल भाजपा से कमाने वाले उनके होनहार नेता का है। यह ऐसे होनहार नेता हैं, जिनकी कोई नहीं सुनता, पर, यह घर पर मजमा सभी लगाते है। यह सारे नेता परस्पर संवादहीनता के शिकार है। अगर पार्टी ऐसे लोगों से नहीं चेती तो वही स्थित होगी, जिसमें ‘डूबी नांव तभी हम जाना, बैठा उंट बंदर और आना’। जीते या हारे सभी नेता और पार्टी के पदाधिकारी अपनी सोच और कर्मो से पार्टी की नैया को डूबोने के लिए तैयार है। नेतृत्व ने अभी नहीं सोचा तो काफी देर हो जाएगी। अगर नेतृत्व नहीं सोचती तो माना जाएगा कि जो कुछ भी हो रहा है, वह जानबूझकर हो रहा, पार्टी को किसी की कोई चिंता नहीं। जिले में जो कुछ भी पार्टी के भीतर और बाहर चल रहा है, वह अब किसी से छिपा हुआ नहीं। जिस तरह पार्टी के लोग एक दूसरे को काटने और नीचा दिखाने का खेल चल रहा है, उससे नुकसान पार्टी और जो लोग खेल रहे हैं, उनका होगा। कहा भी जा रहा है, कि इतने उथल-पुथल में पार्टी कैसे 2027 में वोटर्स का सामना करेगी? और किस आधार पर वोट की भीख मांगेगी। जिस तरह के हालात नजर आ रहे हैं, उससे अब जनता नेताओं को भीख भी नहीं देंगी। कहा भी जाता है, कि प्रदेष अध्यक्ष बदलने से पार्टी को न तो कुछ हासिल होने वाला है, और न कुछ बदलने वाला नहीं हैं, जब तक जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और नगर पंचायत को लूटने वाले भाजपा में रहेगें, तब तक भाजपा जिले में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाएगी, जिसका सपना देख रही है। देखा जाए तो जिले को लूटने वालों ने ही भाजपा के परम्परागत वोट को बिखरने दिया। मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि जब तक भाजपा के नाम पर जिले को लूटने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, तब तक परम्परागत वोट को नहीं बचाया जा सकता। वैसे नाराजगी तो सभी में हैं, लेकिन जो नाराजगी परम्परागत वोटर्स में देखी जा रही है, उसे भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। दिक्कत यह है, कि कोई भाजपा की बेहतरी के लिए नहीं लड़ रहा है, बल्कि भाजपा के नाम पर अधिक से अधिक लूटने के लिए लड़ रहा है। जब भाजपा के लोग ही भाजपा के विरोधी हो जाएगें तो पार्टी की नैया को डूबने से कौन बचा सकता है।