बस्ती। यह जिले के लोगों का सौभार्ग्य हैं, कि जो काम ‘हरीश द्विवेदी’ जैसा नेता नहीं कर सके, उसे ‘जीजा’ और ‘साले’ करने जा रहे है। सवाल उठ रहा है, जब पूर्व सांसद सरकार के अरबों रुपये के बजट से 10 साल के कार्यकाल में जिले में विकास की गंगा नहीं बहा सके, तो उसे नीजि धन से कैसे तीन साल में जीजा और साला मिलकर विकास की गंगोत्री बहाएगें? जो काम सरकार नहीं कर सकी उसे जीजा और साले ने करने का कैसे बीड़ा उठाया है? कहीं यह जिले के लोगों के साथ धोखे की घंटी तो नहीं? यही दोनों लोग पूरे जिले में छाए हुए है। मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे है। विज्ञापन ने अनेक सवालों को कुचल दिया। सवाल उठ रहे हैं, कि जिस तरह धन खर्च किए जा रहे हैं, उसके पीछे मकसद क्या है? और धन का स्रोत क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘रामजी’ का ‘पेड़ा’ खिलाकर 2029 में मेवा खाने की तैयारी कर रहे हैं। अगर यह सच है, तो इनसे सबसे अधिक खतरा पूर्व सांसद को हो सकता है। यही आजकल विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग तो इस बात की भी चर्चा कर रहे हैं, कि कहीं इसी बहाने कालेधन को सफेद करने की तो जाल नहीं बिडाया जा रहा? जीजा को जिले वाले सालों से जान रहे हैं, लेकिन साले को अब जानने का प्रयास कर रहे है। अगर कहीं जीजा और साले की रणनीति सफल हो गई, तो जीजा और साले की जोडी पूरे प्रदेश में हिट कर जाएगी। फिर इस फारमूले का इस्तेमाल जोरों से होने लगेगा। जिस तरह जीजा और साले ने मिलकर जिले की लगभग 28 हजार स्वयं सेवी समूह की महिलाएं जो एनआरएलएम से जुड़ी हुई हैं, उन महिलाओं और युवाओं को 2029 तक समृद्वशाली और आत्म निर्भर बनाने की घोषणा की गई हैं, उन पर अभी से सवाल उठने लगा, और कहा जा रहा है, कि जिन महिला समूहों को सरकार अरबों रुपया खर्च कर आत्म निर्भर और समृद्वशाली नहीं बना पाई, उन्हें कैसे जीजा और साले कर पाएगें? अनेक समूह ऐसी भी जो न तो ठीक से कारोबार कर पा रही है, और लेन-देन कर पा रही, बैंक का पैसा भी चुकता नहीं कर पा रही, कठ्र तो डिफाल्टर तक घोषित हो चुकी है। वर्तमान समय में सिर्फ दो ही व्यक्ति की चर्चा हो रही, एक, पत्थर वाले जीजाजी और दूसरे बानपुर वाले साले साहब की। यह वही पत्थर वाले जीजाजी हैं, जिन्होंने दस साल के सांसद निधि को नीजि की तरह इस्तेमाल किया, और जिसके चलते पूर्व सांसद को काफी बदनामी उठानी पड़ी, चुनाव तक हारना पड़ा। कहना गलत नहीं होगा, कि पूर्व सांसद ने जीजा को जमीन से उठाकर आसमान पर बैठा दिया, बदले में उन्हें हार और बदनामी मिली। जीजा और साले में इतनी जमती है, कि हाल ही में साले ने भांजे को एक कार्यक्रम में एक करोड़ से अधिक की कीमत वाली मसर््िाडीज कार उपहार में दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि यूंही नहीं जीजा और साले ने इतना बड़ा मिशन हाथ में लिया। मीडिया वाले खुष हैं, कि उन्हें बैठे-बैठे इतना बड़ा विज्ञापनदाता जो मिल गया।
जिस तरह पिछले कई दिनों से जीजा और साले की जो चर्चा हो रही है, अगर उसे सच माना जाए तो 2029 में स्काई लैब नेता के आगमन की जमीन तैयार हो रही है। कहने के लिए तो दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक पहुंच है। अपनी इसी पहुंच का फायदा उठा कर समाज सेवा मरीक्ष बनकर बस्ती की भोली भाली जनता को खासतौर पर महिलाओं और युवाओं को लालीपाप देकर अपनी नीति और नीयत दोनों लागू करने की तैयारी कर रहे है। कहने का मतलब बस्ती का एक और लाल नाम से युवाओं और महिलाओं को प्रलोभन देने का काम कर रहे है। युवक, युवतियां, माताएं और बहने चंगुल में फंसती दिखाई दे रही है। यह पैसा कहां से आ रहा है, और उसकी पृष्टि भूमि क्या है? दोनों इस बात का संकेत दे रहे है, कि कथित सेवा के बहाने पेड़ा खिलाकर मेवा खाने का प्रयास हो रहा हैं, रामजी को मालूम ही नहीं उनके पेड़े के नाम पर लाखों का हिसाब-किताब हो गया, यह सारी चीजें हो सकता है, कि 2029 की तैयारी हो, इसके लिए कुछ लोग स्थानीय स्तर पर बैटिगं भी कर रहे है। इस बात की भी चर्चा हो रही है, कि एक ही गंगोत्री से दो नदियां निकलती है, एक सफल होने के बाद भी असफल हैं, और दूसरा उसी टीम का मेंबर 29 की विजय गाथा लिखने की तैयारी कर रहा है। कहा भी जाता है, कि राजनीति में चाल, चरित्र और चेहरा, बदलकर राजनीति करने वाले ही सफल होते है। ऐसे लोगों के लिए अपने पराए में कोई भेद नहीं होता, इनका अर्जुन की मछली की आंख की तरह एक ही लक्ष्य रहता है। 2029 संभव हैं, कि दिल्ली सत्ता की प्रभावी नेताओं की कृपा भी रहे। यह सही है, कि बस्ती की जनता एक बार फिर ठगे जाने के लिए तैयार रहे।
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