बस्ती। 13 साल पहले हुए 1198 पशुधन प्रसार अधिकारियों के भर्ती घोटाले के बहाने तत्कालीन विभागीय मंत्री राजकिशोर सिंह को निपटाने की साजिश हो रही हैं। देखा जाए तो इसी बहाने इनके राजनैतिक भविष्य को अंधकार बनाने की भी तैयारी हो रही है। यह हम नहीं बल्कि राजकिषोर सिंह खेमे के लोग खुलेआम यह कह रहे है। इस बात में कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं मालूम, लेकिन सरकार ने अगर इनके विरुद्व लंबित अभियोजन की अनुमति दे दी तो इन्हें भी आईएएस अधिकारी योगेश कुमार की तरह गिरफतार किया जा सकता है, और अगर कहीं ईडी ने मामले को अपने हाथ में ले लिया तो राजकिशोर सिंह को अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजरना पड़ सकता है। यह कार्रवाई उन मंत्रियों और नेताओं के लिए एक सबक होगा, जो सत्ता के नषे में चूर होकर अपने आप को धरती का भगवान समझने लगते है। मनमानी करने लगते हैं, साम्राज्य खड़ा करने लगते है। अपने आप को अजेय समझने लगते है। ऐसे अजेय लोग इंसान को इंसान समझने के बजाए उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार करने लगते है। अधिकारियों को अपमानित करने और पत्रकारों के साथ दुर्व्यहार करने लगते हैं, घंमड इतना हो जाता है, कि पत्रकारों को जिंदगीभर तक जेल में सड़ाने की धमकी देने लगते है। ऐसा समझने से पहले यह लोग भूल जाते हैं, कि यह राजनीति हैं, और हर समय सत्ता साथ में नहीं रहती। अगर राजकिशोर सिंह भर्ती वाले पत्रावली पर हस्ताक्षर नहीं करते तो आज उन्हें अपना राजनैतिक भविष्य दांव पर लगता हुआ नजर नहीं होता। इतिहास गवाह है, कि जिन नेताओं में घमंड आया, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी, किसी को कुर्सी गवां कर तो किसी को जेल जाकर चुकानी पड़ी। अभी भी जिले में एक दो ऐसे नेता हैं, जिनका पैर जमीन पर नहीं रहता, और यह हमेशा आसमान में उड़ते रहते हैं, लेकिन इन्हें यह नहीं मालूम कि जब वह आसमान से गिरेगें तो जमीन पर ही आएगें, इस लिए किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका वजूद उसकी मिटटी में ही है।

जब से इस मामले में आईएएस अधिकारी की गिरफतारी हुई, तब से राजकिशोर सिंह का नाम सामने आने लगा, और कहा जाने लगा कि इनकी भी गिरफतारी हो सकती है, और यह गिरफतारी तब हो सकती है, जब सरकार अभियोजन की अनुमति देगी। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब सरकार इस मामले से जुडे़ 26 में से 24 के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति दे सकती है, तो क्यों नहीं अभी तक राजकिशोर सिंह और एक अन्य नामजद आरोपी फिरोज गांधी इंस्टीच्यूट के सिस्टम एडमिनिस्टेटर मो. इशरत के विरुद्व सरकार ने अभियोजन की अनुमति दी, और क्यों ऐसे समय आईएएस अधिकारी की गिरफतारी हुई, जब विधानसभा का चुनाव करीब है? यही कार्रवाई अगर एक साल पहले होती तो कोई सवाल नहीं उठता, सवाल तो टाइमिगं को लेकर उठ रहा है। यह कोई नई बात नहीं आई, जब भी चुनाव आता हैं, सरकार नेताओं के पुराने मुर्दे खोदने लगती है। आईएएस अधिकारी की गिरफतारी इस ओर ईशारा करती है, कि अगली बारी राजकिशोर सिंह की है, और इसकी आशंका राजधानी के मीडिया में भी जताई जा रही है। एक तरह से देखा जाए तो यह भर्ती घोटाला आने वाले दिनों में राजकिषोर सिंह के गले की फांस बनने वाली है, अगर यही हालात रहे तो इन्हें चुनाव से बाहर भी होना पड़ सकता है। इसे लेकर अभी से इनके खेमे में हलचल सुनाई देने लगी। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा है, कि राजनीति में कुछ भी संभव है। यहां पर लोग अपनी राजनीति चमकाने के लिए कब किसी पर हमला कर दे, पता ही नहीं चलेगा। अमूमन देखा गया, कि चुनाव के समय सत्ता पक्ष की सरकारे और नेता, विरोधियों पर हमला करती है, लेकिन यहां पर तो सत्ता पार्टी के राजकिषोर सिंह पर हमला होने जा रहा है। इसी लिए कहा जा रहा है, कि राजकिशोर सिंह के साथ खेला हो गया, और यह खेला किसके ईशारे पर हुआ, और किसने किया या करवाया, यह बहुत बड़ा सवाल है। ईडी का इस मामले में सक्रिय होना किसी बड़ी साजिष की ओर ईशारा करता है। राजकिशोर सिंह का खेमा भी किसी बड़ी साजिष से इंकार नहीं कर रहा है। कहते हैं, कि साजिष करने वालों ने इसी बहाने से एक तीर से दो निषाना साधने का प्रयास किया है। किसी के राजनैतिक भविष्य को कैसे दांव पर लगाया जा सकता है, अगर किसी को इसका सच देखना हो तो वह राजकिषोर सिंह के रुप में देख सकता है।