बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि क्या पंकजजी के कैबिनेट में जिले के एक भी भाजपाई शामिल होने लायक नहीं थे, कहने को तो एक से एक भाजपाई हैं, लेकिन जब इन्हें जिम्मेदारी देने की बारी आई तो इन्हें इस लायक भी नहीं समझा कि इन्हें कैबिनेट के किसी कोने में स्थान दे दें। वैसे भी बस्ती उपेक्षा का शिकार पिछले पांच सालों से होता रहा, कभी योगीजी ने पूर्व सांसद के नाते किया तो अब पंकजजी ने किया। इन्होंने किसके नाते किया यह तो नहीं मालूम, लेकिन पार्टी ने 27 में सफाए का अवष्य इंतजाम कर लिया। सवाल उठ रहा है, कि जब गोरखपुर में तीन-तीन उपाध्यक्ष हो सकते हैं, तो क्या बस्ती में एक भी उपाध्यक्ष नहीं, लोग कहते हैं, कि गुजरात लाबी ने योगीजी को कमजोर करने के लिए ऐसा किया, लेकिन बस्ती में ऐसा क्यों किया, यह पता नहीं चल सका। ऐसा लगता है, योगीजी की तरह पंकजजी भी पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के नाते बस्ती को कमजोर करना चाहते हैं। कुल मिलाकर जिस तरह बस्ती की उपेक्षा की गई, उससे पता चलता है, कि आला कमान बस्ती को 27 में सफाया होते देखना चाहती है। पंकजजी ने बस्ती में रिष्तों का ख्याल भी नहीं रखा, अगर रखे होते तो अपने खास को स्थान अवष्य देते है। जो लोग पंकजजी को अपना बहुत ही खास मान रहे हैं, उनके हाथ में 27 में टिकट आने वाला नहीं है। इस लिए नहीं हैं, कि क्यों कि वह अपने खास कहे जाने वालों की हैसियत अच्छी तरह जानते है। चुनाव लड़ने के नाम पर भले ही चाहें जितना लूट सके लूट लें, लेकिन विधायक बनने की मंशा शायद ही कभी पूरी हो। बस्ती के खास लोगों की उपेक्षा करने का मतलब पंकजजी को कमजोर होना माना जा रहा है। पंकजजी का एक दिन भी बस्ती न आना यह साबित करता है, कि जिले के लोग उनकी पहली पंसद नहीं है। जो अपने आपको पंकजजी का खास कहते हुए नहीं थकते वह भी इन्हें बस्ती नहीं ला पाएं। सवाल उठ रहा है, कि आखिर बस्ती किसके दम पर और अगुवाई में 27 का चुनाव लड़ेगी। जो लोग पकंजजी के भरोसे 27 का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें निराशा हाथ लगने वाली है, क्यों कि जिस तरह पदाधिकारियों के चयन में इनकी न चली, ठीक उसी तरह 27 में भी नहीं चलने वाली। कहा भी जाता कि जो प्रदेश अध्यक्ष अपनी पंसद का उपाध्यक्ष नहीं बना सकता, वह क्या टिकट दिलाएगा। जो लोग पंकजजी के भरोसे हैं, उन्हें अभी से अपने आका की तलाश कर लेनी चाहिए। वरना देर हो जाएगी। अनेक भाजपाईयों का कहना है, कि ऐसा कमजोर प्रदेश अध्यक्ष इससे पहले नहीं देखा गया, जो हर चीज दिल्ली वालों से पूछ कर करे। प्रदेश का तो नहीं मालूम लेकिन बस्ती से भाजपा के सफाए का मंजर अभी से यह दिखाई दे रहा है। एक बार फिर जिला गुटबाजी और प्रदेश की उपेक्षा का षिकार हो रहा है। अगर विपक्ष ने इस कमजोरी का फायदा उठा लिया तो जो एक सीट बची है, वह भी चली जाएगी। जिले के लोगों को पंकजजी से बहुत उम्मीद थी, लेकिन उन्होंनें भी निराष किया। सबसे अधिक खराब स्थित हारे हुए चारों विधायकों की है। इन्हें खुद नहीं मालूम कि चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा भी कि नहीं? इन सभी के सामने भी असमंजस की स्थित उत्पन्न हो गई, ऐसे-ऐसे भाजपाई इनके सामने ताल ठांेक रहे हैं, कि इनका अस्तित्व ही समाप्त होते नजर आ रहा है। पता नहीं चारों में से कोई विधायक बन भी पाएगा कि नहीं, अगर किस्मत के चलते टिकट मिल भी गया तो जो भाजपा का माहौन बन रहा है, उसमें जीतना कठिन होगा। विधायक बनने को कौन कहे, टिकट के भी लाले पड़ जाएगें। इन्हें फिर उन्हीं लोगों का सामना करना पड़ेगा, जिनसे पहले पड़ चुका। ध्यान रहे इन लगभग पांच सालों में कुछ भी नहीं बदलाव नहीं हुआ। बल्कि पहले से अधिक गुटबाजी और खींचतान हो रही है। पटकने और पटकनी देने के दावं अभी से सीखे जा रहे है। चिढ़ाने का भी दौर चल रहा है। कहने का मतलब डैमेज को न तो पार्टी और न संगठन ही कंटोल करने का प्रयास कर रहा है। पंकजजी को जो कैबिनेट की टीम दी गई, वह कितना फायदेमंद होगा, यह 2027 में देखने वाला होगा। इस टीम पर पंकज चौधरी का राजनीति का भविष्य तय करेगा।