बस्ती। कहना गलत नहीं होगा, कि सूदखोंरों का अगर कोई ईमान-धरम हैं, तो वह है, पैसा। यह पैसे के लिए इस हद तक जा सकते हैं, कि जिसे कोई सोच भी नहीं सकता, किसी की जान जाने तक का यह कारण बनते जा रहे है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर बाबू साहब के कारण ही लोग आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं? आखिर यह इतने बेरम क्यों होते जा रहे है। ब्याज पर पैसा लेने वाले अगर यह जान जाए कि यही पैसा उनके मौत का कारण बनेगा तो शायद ब्याज पर पैसा कभी न ले। ब्याज पर पैसा देने वालों का कोई वसूल नहीं होता है, वरना अगर कोई 14 लाख के स्थान पर 44 लाख चुकाता है, तो उसे जिंदा रहना चाहिए, यानि तीन साल में तीन सौ फीसद से अधिक ब्याज देकर भी मुंडेरवा के व्यापारी उमेषचंद्र अग्रहरि को अपनी जान सूदखोरों के चलते गवानी पड़ी। मृतक के पुत्र राहुल अग्रहरि की ओर से मुंडेरवा में दर्ज कराए एफआईआर में कहा गया है, कि उसके पिता ने 2023 में रामपुर रेवती निवासी गंगा सिंह उर्फ लोटन सिंह पुत्र चंद्रप्रकाश से कारोबार के लिए 14 लाख ब्याज पर लिया, कितने फीसद ब्याज पर लिया, सह नहीं बताया गया, लिखा कि मेरे पिता समय-समय पर मूलधन और ब्याज का पैसा चुकाते रहें, अब तक लगभग 44 लाख चुकता कर चुके, फिर भी पिता से लगातार पैसे की मांग करते रहें। फोन पर गालीगलौज भी करते रहे। मानसिक प्रताड़ना देते रहे, जान से मारने की धमकी भी देते रहे। धनराशि चुकाने के बाद भी गंगा सिंह के चचेरे भाई अमित सिंह उर्फ बबलू ने मिलकर पिता को निरंतर मानसिक आर्थिक एवं सामाजिक रुप से प्रताड़ित किया। कहा कि दोनों व्यक्तियों के द्वारा पिता अत्यधिक तनाव में रहते थे, इसी तनाव में आकर पिता ने 21 जून 26 को सुबह साढ़े छह बजे आत्महत्या कर लिया। शिकायत करने पर जान से मारने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देते थे। कहा कि पिताजी की जेब से दो पत्र मिले जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए दोनों को जिम्मेदार बताया।
‘क्यों’ नहीं ‘करोड़ों’ बकाए वाले ‘आत्महत्या’ कर ‘रहें’?
इधर जितने भी सूदखोरों के चलते बकाएदार आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें लाखों और हजारों वाले ही कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है, कि वे लोग क्यों नहीं आत्महत्या कर रहे हैं, जो करोड़ों के बकाएदार है? क्या इन्हें समाज और इज्जत की कोई चिंता नही है? क्या इन्हें इस बात की भी चिंता नहीं हैं, कि इन्हें उधार भी चुकता करना है? क्या लाखों और हजारों वाले बकाएदारों को ही चिंता है? शहर में एक ऐसा परिवार भी है, जिनके उपर न जाने कितने का कर्ज हैं, कर्ज अदा न कर पाने के कारण कई बार लोगों को सड़क पर भी उतरना पड़ा, धरने पर भी बैठना पड़ा, लाइव पर आकर उधार का पैसा मांगना पड़ा, न्यायालय तक लोगों का जाना पड़ा, न्यायालय को एनबीडब्लू तक जारी करना पड़ा, फिर भी परिवार के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। परिवार को जरा भी इस बात का एहसास नहीं हुआ, कि लोग उनके बारे में क्या-क्या कह रहे हैं। जो लोग कोर्ट गए हैं, या फिर नहीं गएं हैं, उन लोगों का कहना है, कि अगर इस परिवार को जरा भी इज्जत का डर होता तो कब का बकाया चुकता कर दिया होता, ऐसा भी नहीं कि परिवार के पास धन और अचल संपत्ति की कोई कमी हो, कमी है, तो सिर्फ नीयत साफ न होने की। कहा भी जाता है, कि जिस व्यक्ति का नीयत खराब होता है, उसके लिए मान-सम्मान और इज्जत जाने का कोई डर नहीं रहता है। ऐसे लोग भी है, जिन्हें हजार रुपया भी चुकता न कर पाने के कारण रातभर नींद नहीं आती। वहीं कुछ लोग ऐसे भी जो करोड़ों का बकाएदार हैं, फिर भी वह आराम की नींद ही नहीं सोते बल्कि ऐसो आराम की जिंदगी भी जीते है। हैरानी की बात यह है, कि ऐसे लोगों को करोड़ों उधार देने को भी लोग यह जानकर तैयार हो जाते हैं, कि आदमी ठीक नहीं हैं, या फिर मार्केट में रिकार्ड खराब है। बैंक वाले भी ऐसे लोगों का स्वागत करते है। लोग एक दूसरे से पूछते हैं, कि ऐसे लोगों को नींद कैसे आती होगी? कहा भी जाता है, कि जिस व्यक्ति ने विष्वास खो दिया, समझो उसने दौलत खो दिया। विष्वास ही एक ऐसी चीज है, जो कुछ भी करा सकती है, और कर सकती। अक्सर लोगों को कहते हुए सुना जाता है, कि भलां व्यक्ति पर कभी विष्वास मत करना, नहीं तो धोखा मिलेगा। अब फिर सवाल उठ रहा है, कि जब सभी लोगों को मालूम हैं, कि फंला परिवार विष्वास के लायक नहीं हैं, तो फिर क्यों विष्वास करके लाखों नहीं करोड़ों दे देतें है। आखिर वह किस विष्वास पर करोड़ों देते हैं, इसका सीधा सा जबाव होता है, करोड़ों देने वाले को वापस लेना भी आता है, सूद समेत लेना आता हैं, और लेते भी है, नहीं देने पर कभी स्कूल लिखवा लेगें तो कभी जमीन अपने नाम करवा लेगें।
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