बस्ती। पीडब्लूडी के ठेकेदार संजय सिंह पगार के उस शिकायत पर ठेकेदार ही सवाल उठा रहे हैं, पूछ रहें हैं, जब संजय सिंह पगार को अपात्र अधीक्षण अभियंता ने किया तो फिर क्यों टेंडर बाबू प्रेमचंद्र को निशाना बनाया गया? क्यों नहीं एसई को निशाना बनाया गया? कार्यालय और मंडल भर के ठेकेदारों को मालूम हैं, कि शिकायत किस लिए की गई, ठेकेदार लाबी दोनों को गलत मानती है, और कहती है, कि अगर शिकायतकर्त्ता में हिम्मत होती तो वह एसई के खिलाफ करते, यह भी कहते हैं, कि एसई के खिलाफ इस लिए शिकायत नहीं किया, ताकि ठेकापटटी बंद न हो, डर इस बात का था, कि अगर साहब की शिकायत कर दी तो कहीं पीडब्लूडी से उनका बोरिया बिस्तर न बंध जाए, क्यों कि जब अधिकारी का मामला सामने आ जाता है, तो सारे अधिकारी एक हो जाते हैं, फिर मजबूत से मजबूत ठेकेदार का काम करना मुस्किल हो जाता है। ऐसा भी नहीं कि प्रेमचंद्र कोई दूध के धुले है। इससे पहले भी तत्कालीन पीडब्लूडी निर्माण खंड एक के एक्सईएन हरेंद्रनाथ पांडेय के साथ भी प्रेमचंद्र ने कुछ ऐसा किया ही किया था, तब उन्होंने प्रेमचंद्र और राजन को लखनउ अटैच करवा दिया, दोनों की हेकड़ी भूल गई थी, प्रेमचंद्र को किसी भी ठेकेदार ने ईमानदार नहीं बताया, लेकिन इतना अवष्य कहा कि, की गई शिकायत में सारी बातें सही नहीं है। प्रेमचंद्र गुटबाजी का भी शिकार हुए है। इनकी पोल कार्यालय के एक रिटायर बाबू ने खोली। जिस ठेकेदार की शिकायत पर अगर ठेकेदार ही सवाल उठाते हैं, तो माना जाता है, कि कहीं कुछ न कुछ दाल में काला है। कहते हैं, कि संजय पगार को अच्छी तरह मालूम था, कि उनका पेपर अधूरा है, और वह अपात्र हो सकते हैं, इसके लिए उन्होंने प्रहरी एप में जुगाड़ से ओके करवा लिया, लेकिन जब एसई स्तर पर पेपर चेक हुआ तो यह अपात्र पाए गए। पेपर की छानबीन करना टेंडर बाबू का काम होता है, और वही साहब को बताता हैं, कि कौन पात्र और कौन अपात्र है? उसी आधार पर साहब निर्णय लेते है। वैसे जांच तो लखनउ में बैठे उन प्रहरी एप के अधिकारियों की भी होनी चाहिए, कि जिन्होंने अपात्र को पात्र बना दिया, कहने का मतलब लखनउ वाले साहब ने जिसे पात्र माना उसे बस्ती वाले साहब ने अपात्र माना। ठेकेदारों का यह भी दावा है, कि कुछ होने जाने वाला नहीं हैं, क्यों कि जब टेडर बाबू फंसेगे तो साहब सामने खड़े होगें। वैसे भी नेताओं के शिकायतों पर कोई भरोसा नहीं रहता, न जाने कितनी बार देखा गया, कि नेता षिकायत तो करते हैं, लेकिन जैसे ही वह लाभान्वित होते हैं, यह लिखकर दे देते हैं, कि किसी ने उनके पैड का दुरुपयोग किया। जबकि असलियत शिकायत नेताजी ही किए रहते है। अनेक ठेकेदारों का कहना है, कि अगर शिकायत वाकई आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की, की गई तो उसकी जांच होनी चाहिए, लेकिन अगर किसी दुर्भावना वष की गई तो सही नहीं है। यह भी कहते हैं, कि पीडब्लूडी में कौन ऐसा टेंडर बाबू हैं, जिसने आय से अधिक संपत्ति अर्जित न की हो। यहां पर अगर चपरासी की जांच हो जाए तो उसके पास भी आय से अधिक संपत्ति निकल आएगा। षिकायत भले ही किसी और को निशाना बनाकर किया गया हो, लेकिन इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि इसी बहाने विभाग में कुछ सुधार हो जाए। वैसे जांच तो रिटायर राजन बाबू की भी होनी चाहिए। बस्ती के एक ठेकेदार जो बाहर काम करते हैं, का कहना है, कि जब भी हम लोगों को यह लगता है, कि टेंडर पेपर में कुछ कमी है, तो वह लखनउ में प्रहरी एप में सुधार करवा लेते हैं, लेकिन जनपद के अधिकारियों और टेंडर बाबू को भी विष्वास में लेते हैं, क्यों कि असली पेपर की जांच तो स्थानीय अधिकारी और टेंडर बाबू ही करेगा। हो सकता है, कि लखनउ में तो मैनेज हो गया होगा, लेकिन बस्ती में नहीं हो पाया होगा, या फिर यह भी हो सकता है, कि गुटबाजी के कारण ऐसा हुआ होगा। बहरहाल, पहली बार संजय पगार ने शिकायत करके जो पहल किया हैं, उसे सरायनीय माना जा रहा है, लेकिन इसे अंजाम तक पहुंचाना भी इन्हीं ही जिम्मेदारी हैं, अगर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो यह मान लिया जाएगा, कि मामला मैनेज हो गया, संजय मैनेज हो गए, या फिर जांच टीम हो गई। वैसे अधिकारी, बाबू के बचाव में हैं, क्यों कि उनकी बचाव में ही अधिकारी का बचाव है। वैसे बाबू के तबादले के लिए कैबिनेट मंत्री आशिष पटेल पत्र भी लिख चुके हैं, लेकिन तबादला नहीं हुआ, संजय पगार को इसी से अपने मंत्री की हैसियत का अंदाजा लगा लेना चाहिए। जिस विभाग में पैसा ही सबकुछ हो, उस विभाग में कैबिनेट मंत्री की कितनी सुनी जाएगी, इसका अंदाजा प्रेमचंद्र के तबादला न होने से लगाया जा सकता है।