बस्ती। 15वां वित्त आयोग के पांच करोड़ के लिए सभी सीएमओ के पीछे पड़े हैं, काम पाने के लिए कोई मंत्री तो कोई सचिव से सिफारिश करवा रहा है, स्थानीय अधिकारी तो यह तक कह रहे है, कि अगर उनके आदमी को काम नहीं मिला तो सीएमओ साहब समझ लीजिएगा। कहने का मतलब हर कोई सीएमओ पर दबाव बना रहा है, समझ लेने और कार्रवाई करने की धमकी तक दे रहा है। स्थानीय ठेकेदार अलग से अपने-अपने स्तर से काम पाने के लिए पांसा फंेक रहे है। सीएमओ को समझ में नहीं आ रहा है, कि वह करें तो क्या करें? किसकी बात माने और जिसकी नहीं? अगर मानते हैं, तो फंसने का डर रहेगा, नहीं मानते हैं, तो धमकी मिलेगी, रिटायरमेंट करीब हैं, इस लिए सीएमओ साहब भी इस मामले में कोई रिस्क लेना नहीं चाहेंगें। कार्यालय के लोगों का कहना है, कि सीएमओ के सामने ऐसी स्थित इससे पहले कभी नहीं आई और न सीएमओ साहब इसे लेकर कभी इतना परेशान हुए। कुछ लोग सीएमओ साहब को परेशानी से बचने के लिए टेंडर कराने की बात कह रहे हैं, हालांकि सीएमओ को भी यह अच्छी तरह मालूम हैं, कि अगर उन्होने टेंडर करवा दिया तो उनके हाथ कुछ आने वाला नहीं हैं, वही चार फीसद आएगा, जो आता रहता है। खासबात यह है, कि टेंडर कराने वाले ठेकेदार बहुत कम हैं, वही ठेकेदार हैं, जो अपना काम ईमानदारी से करते हैं, अधिकतर वे ठेकेदार हैं, जो जेम पोर्टल पर सामान को 12 रुपये में गुणवत्ता परक खरीदते हैं, लेकिन जब आपूर्ति करने की बारी आती है, तो पांच रुपये में गुणवत्ताहीन सामान खरीद कर आपूर्ति कर देते है। देखा जाए तो एक सामान पर ठेकेदार को लगभग सात रुपया का लाभ हुआ, दो रुपया अगर ठेकेदार ने कमीशन के रुप में दे भी दिया तो भी ठेकेदार का पांच रुपया बचा। इसी पांच रुपये की चोरी करने के लिए वह सारा खेल खेलता हैं, फर्जीवाड़ा करता। यह पांच रुपया जाकर लाखों में बदल जाता है। अधिकांश ठेकेदार यह नहीं जानते कि जो पांच करोड़ का बजट आया, उसमें मुस्किल से सीएमओ के हाथ में लगभग साढ़े तीन करोड़ आएगा, अवशेष बजट जिला अस्पताल के एसआईसी, महिला सीएमएस, हर्रैया 100 बेड के सीएमएस और टीबी अस्पताल के सीएमएस को चला जाता है। इसमें लगभग 50-60 लाख एसआईसी को, लगभग 35 लाख जिला महिला अस्पताल के सीएमएस को, इतना ही हर्रैया महिला अस्पताल के सीएमएस और लगभग 20 लाख टीबी अस्पताल के सीएमएस को चला जाएगा। इस तरह पांच करोड़ में से लगभग एक करोड़ 40 लाख सीएमएस और एसआईसी को चला गया। बचा तीन करोड़ 60 लाख, इस पैसे से सीएमओ को 39 पीएचसी और लगभग 365 एएनएम सेंटर को जांच किट खरीदकर देना है। इसी तीन करोड़ 60 लाख का काम पाने के लिए मारामारी हो रही है। ठेकेदारों का सारा जोर सीएमओ पर हैं, लेकिन अगर यही जोर एसआईसी और तीनों सीएमएस पर लगा दे तो अच्छा खासा लाभ हो सकता है। मान लीजिए कि अगर ठेकेदारों को 3.60 करोड़ के जांच किट के सामानों की आपूर्ति का ठेका मिल गया, तो उसमें वे लोग लगभग डेढ़ से दो करोड़़ बचा लेगें, अब सवाल उठ रहा है, कि कितने ठेकेदारों को काम मिलेगा, अगर ठेकेदारों ने मिलकर काम बांट लिया तो सभी फायदे में रहेगें, लेकिन नहीं मिले, और टेंडर हुआ तो नुकसान में रहेगें, फिर ठेकेदारों को यह पता नहीं रहेगा, कि उसे ही काम मिलेगा। साल 2024-25 में सीएमओ को अकेले लगभग चार करोड़ का बजट मिला था, तब इन्होंने आरसीएच के साथ मिलकर खूब गोलमाल किया, तभी तो दूबेजी ने आरसीएच को 16 लाख की कार कमीषन में दी थी। अगर वर्तमान सीएमओ के स्थान पर तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे होते तो सारा काम वह अपने उन लोगों को देते और लाभ कमाते, जिसे वह प्रयागराज से लाए थे, अगर वर्तमान सीएमओ तत्कालीन सीएमओ की तरह होते तो उन्हीं को काम मिलता जो उन्हें सबसे अधिक कमीषन देता। तत्कालीन सीएमओ सिर्फ लेना जानते थे, देना नहीं, अगर देना जानते तो इनके खिलाफ विजिलेंस जांच न होती, संबधिक अधिकारी मामले को दफा रफा करने के लिए इनसे तीन लाख मांगा, लेकिन यह 50 हजार से अधिक देने को तैयार नहीं थे, उसके बाद जो हुआ, वह सीएमओ के लिए मंहगा पड़ गया, बस्ती में तो यह विजिलेंस की जांच झेल ही रहे हैं, प्रयागराज में भी झेल रहें है। सीएमओ कार्यालय के लोग यह कहते भी है, कि किसी भी सीएमओ को इतना भी सीधा और ना समझ नहीं होना चाहिए, कि लोग उसका फायदा उठा सके। सीएमओ ने जिस प्रेम बहादुर सिंह नामक बाबू पर भरोसा किया, उसी ने इन्हें फंसा दिया। चूंकि इनके भीतर कार्रवाई करने की क्षमता नहीं हैं, इस लिए सीएमओ ने अभी तक प्रेमबहादुर सिंह के खिलाफ 40 लाख का फर्जी भुगतान करने और संबधित पत्रावली गायब करने के आरोप में कोई कार्रवाई नहीं किया, अगर दूबेजी होते तो कार्रवाई और एफआईआर कराने का डर दिखाकर लाखों वसूल चुके होते, वैसे इस मामले में दीपक कुमार मिश्र एफआईआर दर्ज करने के लिए डीएम, सीडीओ और एसपी को पत्र लिख भी चुके है। पहली बार किसी ठेकेदार ने एसपी को लिखा।
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