बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि कैसे सपा सरकार का दागी मंत्री भाजपा सरकार का चहेता और पाकसाफ हो गया, इतना चहेता और पाकसाफ हो गया, कि उसके खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति तक नहीं दी जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है, कि भ्रष्टाचार को लेकर सपा और भाजपा में क्या फर्क रह गया? हम बात कर रहे हैं, प्रमुख सचिव योगेश कुमार के बाद राजकिषोर सिंह के सिर पर लटकती गिरफतारी के तलवार की। जिस तरह मीडिया में इसे लेकर डिबेट हो रहे हैं, और प्रिंट मीडिया की सुर्खियां बनी हुई है, उससे राजकिशोर सिंह की परेशानी बढ़ती नजर आ रही है। चूंकि राजकिशार सिंह एक अफेंसिव नेता माने जाते रहें हैं, इनका यह कहना कि जितना मीडिया उनके बारे में लिखेगी या चर्चा करेगी, उतना उन्हें लाभ होगा, यही इनकी सोच इनके लिए घातक साबित होने सकता है। इन्होंने कभी भी मीडिया रिपोर्ट पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना इनके विरोधी देते है। अगर यह अग्रेसिव मूड में रहते तो मीडिया पर ध्यान देते, तब इन्हें पता चलता कि इनका विरोधी इनके खिलाफ क्या कर रहा है, और उन्हें क्या कर रहा? नेताओं को अफेंसिव और एग्रेसिव दोनों होना चाहिए। कहा जाता है, कि इस मामले में इनका विरोधी बहुत सक्रिय है। यही सक्रियता बाद में चलकर राजकिशोर सिंह के लिए भारी पड़ सकता है। अब हम आप लोगों को भाजपा की नीति की तरफ ले चलते है। सवाल उठ रहा है, कि जब पशुधन प्रसार अधिकारी घोटाले की एसआईटी जांच का आदेश भाजपा सरकार ने दिया तो क्यों नहीं अभी तक अभियोजन की स्वीकृति दिया? और क्यों नहीं अभियोजन की स्वीकृति की पत्रावली को आगे बढ़ाया? क्यों इतने सालों तक पत्रावली को दबाए रखा? हैरानी होती है, कि जिस सूबे के मुखिया ने एसआईटी बनाया, वही मुखिया इतने सालों तक चुप रहा, क्यों चुप रहा? यह सवाल बना हुआ है। इधर के दिनों में जो कुछ राजकिशोर सिंह को कयास लगाए ला रहे हैं, उसे किसी की साजिश के होने के आरोप को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। लेकिन इतने सालों से सूबे के मुखिया का अभियोजन के स्वीकृति की पत्रावली आगे न बढ़ाने के मामले में चुप्पी साधे रहने पर सवाल अवष्य उठ रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि सपा और भाजपा सरकार में दागी और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई न करने के मामले में कोई फर्क नहीं है। आज जब चुनाव करीब आ गया तो भ्रष्ट अधिकारी और भ्रष्ट मंत्री नजर आने लगे। जब भाजपा की नजर में राजकिशोर सिंह दागी रहे, तो फिर भाजपा ने उन्हें अपनी गोद में क्यों बैठाया? क्या भाजपा को वह फायदा हुआ, जिसके चलते एक दागी को गोद में बैठाना पड़ा।
आज के नेताओं को यह सोचना होगा, कि जब भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होती तो जनता यह क्यों कहती है, कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’? क्यों नहीं आम जनता यह कहती है, कि नेताजी ऐसे नहीं थे, कार्रवाई गलत हुई, या यह क्यों नहीं कहती कि नेताजी को गलत फंसाया गया। लोगों को याद होगा कि जब हर्रैया के विधायक अजय सिंह के लजघटा स्थित आवास और लखनउ के कार्यालय पर ईडी और आईटी की कार्रवाई हुई तो आम जनता ने यह नहीं कहा कि कार्रवाई गलत हुई, बल्कि यह कहा कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’। यही बात जब पषुधन प्रसार अधिकारी घोटाले में जब राजकिशोर सिंह के गिरफतारी की बाते उठी तो आम जनता ने यह नहीं कहा कि अगर गिरफतारी होगी तो गलत होगा, बल्कि यह जा रहा हैं, कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’। जब भी नेताओं के खिलाफ इस तरह की कोई कार्रवाई होती है, तो सोशल मीडिया और आम चर्चा में यही कहा जाता है, कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’। खुले आम लोग अपनी राय रखते हैं, और जो राय रखते हैं, वह नेताओं के लिए ‘गुड न्यूज’ की तरह नहीं होती है। यहां पर किसी नेता के खेमे या फिर उनके समर्थक की बात नहीं कही जा रही है,, बल्कि उस जनता की राय के बारे में कही जा रही है, जिसके वोट पर लोग सांसद और विधायक बनते है। ऐसे नेताओं को यह मंथन करना होगा, कि जिस जनता ने उन्हें हीरो बनाया, वही जनता उन्हें क्यों विलेन मानने लगती? इसी तरह जब भी कोई बड़ा नेता चुनाव हारता है, तो उसकी हार का कारण आम व्यक्ति नेता का घंमडी और जनता से दूर रहना कहने लगती है। पिछले कई सालों से देखा जा रहा है, कि कोई नेता जनता का हीरो नहीं बन पा रहा है। इसका कारण जनता उन नेताओं को जिम्मेदार मानती है, जो जीतने के बाद जनता की उपेक्षा करने लगते है, और अधिक से अधिक पैसा बनाने में लग जाते है। जिस जनता को चुनाव के दौरान वोटर्स को भगवान और अपने आप को जनता का सेवक कहते नहीं थकते, वही नेता जनता की समस्या तक को भी ठीक से नहीं सुनते निस्तारण करने या कराने की तो बात ही भूल जाइए। कहना गलत नहीं होगा कि नेताओं ने अपने कामकाज की समीक्षा करना ही बंद कर दिया, जनता उनके बारे में क्या सोचती हैं, और क्या कहती है, तक जानने का प्रयास नहीं करते, अगर कोई सत्ता दल का नेता हुआ तो वह सत्ता के नषे में इतना चूर रहता है, कि वह अपने आप को धरती का भगवान समझने लगता है। ऐसे नेता जनता को अपने उस राज के बारे में भी नहीं बताते कि जिसके चलते उनकी संपत्ति में दिन दिन इजाफा होता है। यह नेताओं के उस शपथ-पत्र से भी पता चलता हैं, जो उसने पहला चुनाव लडतें समय दाखिल किया था। एक ही चुनाव में न जाने कैसे नेताजी की संपत्ति साढ़े सात करोड़ से बढ़कर लगभग 14 करोड़ हो जाती है? नेता कैसे इतने कम समय में अकूत संपत्ति के मालिक हो जाते हैं, यह लोगों की समझ में आज तक नहीं आया, जिस तेजी से नेताओं का जीडीपी दर बढ़ता हैं, अगर देश का बढ़े तो देष कहां से कहां पहुंच जाए। पहले के लोग धन को छिपा कर रखते थे, ताकि किसी की नजर न लग जाए, लेकिन आज का नेता धन का प्रदर्शन करते है। वह जनता को यह बताने से नहीं चूकते कि अब वह पहले जैसे नेता नहीं रहें। नेताओं की बढ़ती संपत्तियों को देखकर लोग नेता बनने के आतुर रहते है। राजकिशोर सिंह माने या न माने उनकी मर्जी, लेकिन यह बात तो साफ होती नजर आ रही है, कि राजकिशोर सिंह को 2027 के चुनाव से किनारा करने की कवायत हो रही।
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