बस्ती। बहुत कम सुना गया कि हाईकोर्ट अपने ही आदेश को मात्र आठ दिन में रिकाल कर लें। जानकारों का कहना है, कि इस तरह का मामला हजार में एक देखने को मिलता है। इस रिकाल आदेश का सबसे अधिक प्रभाव सीएमओ और डीएम पर भविष्य में पड़ सकता है, क्यों कि अगर दीपक कुमार मिश्र की अपील पर होईकोर्ट ने उच्च स्तरीय जांच का आदेश दे दिया तो उसकी गाज सीएमओ और डीएम दोनों पर भविष्य में गिर सकती है। रिकाल के बाद अब न तो जय कांस्टक्षन को कोई काम मिल सकता है, और न भुगतान ही हो सकता है, अगर ऐसा सीएमओ करते हैं, उनके लिए और बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है, वैसे ही बाबूजी के चक्कर में पड़कर अपने के लिए मुसीबत मोल ले चुके है। जानकारों का कहना है, कि उच्च स्तरीय जांच के बाद विभाग सबसे पहले सीएमओ को निलंबित करेगा, और उसके बाद विभागीय जांच शुरु हो जाएगी। वैसे भी कहा जाता है, कि हाईकोर्ट के उच्च स्तरीय जांच के आदेश के बाद कोई अधिकारी बहाल नहीं होता, वह रिटायर हो जाएगा, लेकिन बहाल नहीं हो सकता। अगर इतना बड़ा रिस्क कोई सीएमओ लेते हैं, तो उसे अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है। रही बात जय कांस्क्टशन के जनेष्वर चौधरी की तो लगता है, कि इनकी किस्मत में स्वास्थ्य विभाग की मलाई खाना नहीं लिखा है। बर्फी का टुकड़ा इनके मुंह तक जाते-जाते रह जाता है। वैसे भी जब तक मामला हाईकोर्ट में लंबित हैं, इन्हें हाथ पर हाथ रखकर संतोश करना पड़ेगा। याचिका रिकाल होना सीएमओ की पूरी टीम के लिए किसी अंजान खतरे की घंटी बजने जैसा माना जा रहा है। इस टीम को लगा था, कि अब तो रिट खारिज हो गया, यह जष्न मनाने की घड़ी हैं, लेकिन शायद इन लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि हाईकोर्ट खारिज यााचिका को रिकाल भी कर सकती है, क्यों कि ऐसा बहुत कम होता है।  हाईकोर्ट ने 26 मई 26 को दीपक कुमार मिश्र की याचिका को खारिज करते हुए कहा था, कि अगर याची को यह लगता है, कि उसको न्याय सिर्फ हाईकोर्ट से मिल सकती है, तो वह रिकाल की याचिका दाखिल कर सकते है। चार मई 26 को दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने अपने 26 मई के आर्डर को रिकाल कर लिया। जय कांस्टक्षन को अनियमित रुप से अनुबंध करना, डीएम, एडी हेल्थ और सीएमओ को भारी पड़ने वाला है। हाईकोर्ट में इन लोगों के खिलाफ शिकायतकर्त्ता दीपक कुमार मिश्र की ओर से याचिका दायर करने के बाद लगने लगा था, कि अब तो सबकुछ समाप्त हो गया। मीडिया बार-बार उन लोगों को चेता रही थी, जो लोग अनियमित रुप से अनुबंध कराने में लगे हुए थे, इस बात की भी चेतावनी दी गई थी, कि अगर मामला हाईकोर्ट चला गया तो अधिकारियों तो के लिए जबाव देना कठिन हो जाएगा। मामला हाईकोर्ट गया भी, लेकिन जब 26 मई को हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया तो लगने लगा था, कि अब सबकुछ ठीक हो जाएगा, और बाबूजी के जनेष्वर चौधरी का सीएमओ के यहां का मलाई काटने का सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन चार जून के रिकाल के बाद मलाई काटने का सपना अधूरा रह जाएगा। अब डीएम यह नहीं बता पाएगी कि जब आपके निर्देष पर जांच चल लंबित थी, तो फिर आपने कैसे अनुबंध करने का अनुमोदन दे दिया। सीएमओ इस बात का भी अब जबाव नहीं दे पाएगें, कि जब टेंडर लगभग डेढ़ माह पहले फाइनल हो चुका था, तो उसे क्यों इतने दिनों तक रोका गया? कैसे और क्यों वित्तीय साल के अंतिम दिन यानि एक ही दिन में सत्यापन कर लिया और उसी दिन यानि 30 मार्च को अनुबंध भी गठित कर दिया। जबकि जांच लंबित है। सबसे खराब स्थित जांच अधिकारी एडी हेल्थ की होगी। इनकी जांच रिपोर्ट देख कोई भी न्यायाधीष मानने पर मजबूर हो जाएगें, कि जांच रिपोर्ट पूरी तरह सीएमओ को बचाने और जय कांस्टक्षन को लाभ पहुंचाने के लिए बनाया गया।